शोधों से साफ़ पता चला है कि ताजे फल ,अंकुरित अनाज, हरी सब्जियां ( सलाद ) एवं काष्ट्ज फल में विकाश ,वृद्धि एवं जीवन संचालन पूर्णता प्राप्त कर केवल रोग से ही रक्षा नहीं कि जा सकती बल्कि मन में प्रसन्नता, शरीर में शक्ति एवं आत्मा में आनन्द की अनुभूति के साथ यौन शक्ति उन्नत की जा सकती है !
ताजे फल यानि की अगर मौसमी फल का सेवन करें तो शरीर के लिए ज्यादा फायदा मिलता है !
काष्ट्ज फल यानि बादाम, काजू, मूंगफली इत्यादि किशमिश, अंजीर छुआरा भिगोकर ही सेवन करना चाहिए !
तांवे या चांदी के वर्तन में रात का रखा हुआ पानी चार गिलास तक प्रातः शौच जाने से पूर्व ही पीना चाहिए | इसका सेवन से व्यक्ति अनेकानेक रोगों से मुक्ति मिल सकता है ! तो वासी पानी तांवे के वर्तन के खूब पिए और जिन्दगी को रोगमुक्त करें ! इस तरह लगातार सेवन से आंतो की सफाई व कब्ज से छुटकारा मिलेगा ! मतलब उदर के किसी भी प्रकार के विकारों से स्थायी रूप से लाभ मिलेगा |
व्यायाम से शरीर में हलचल होती है जिससे ब्लड सुचारी रूप से पुरे शरीर दौड़ जाती है | व्यायाम हरेक प्रकार के शारीरिक समस्या में लाभदायक होता है | नियमित अभ्यास से शरीर की बेचैनी, अस्थिरता, आलस्य एवं मोटापा में कमी होती है |
विश्व में व्यायाम ही एक ऐसी प्रक्रिया है जिससे अन्तः-स्त्रावी ग्रन्थियों या हार्मोन बनाने वाली ग्रन्थियों को प्रभावित करती है | इससे रोग प्रतिरोधक क्षमता , शांति, आनन्द एवं दीर्घायु प्राप्त होती है | इससे स्नायु दुर्बलता दूर हो जाती है एवं याददाश्त बढ़ जाती है | दूरदर्शिता, रचनात्मक सोच एवं समस्याओं को हल करने की कुशलता आ जाती है !
वर्तमान परिवेश यानि भागती दौड़ती जिन्दगी में अगर कुछ है जिससे आप स्वस्थ्य जीवन को जी सकते है तो वो है "एलोवेरा जेल" ! जिसके नियमित सेवन से आँतों की सफाई, शरीर के अन्दर "toxin " को बाहर कर देता है | आँतों की सफाई तो ऐसे हो जाता है जैसे की दीपावली में घर की सफाई होती है | फिर उसमे समाहित गुणों के भंडार शरीर को संचालन के लिए बेहद जरुरी है !
अतः एलोवेरा अगर दैनिक भोजन के सूचि में है तो परेशान होने की जरुरत नहीं वो सब कुछ आपके शरीर को मिलेगा जो शरीर को चाहिए !
याद रखें :- प्राकृतिक चिकत्सा एवं व्यायाम एक ही गाडी के दो पहिये है इनको छोड़कर अन्य कोई भी चिकत्सा पद्धति पूर्ण स्वास्थ्य प्रदान नहीं कर सकती !
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"एलोवेरा " दिल को रखें दुरुस्त - एलोवेरा जेल से !
सर्दियों में भी रखें त्वचा जवाँ - एलोवेरा युक्त उत्पाद से ! !

केला एशिया का फल है और यह गर्म देशों में पैदा होता है | हमारे यहाँ तो पूजा अनुष्ठान में केला का फल रखा जाता है , इसीलिए उपयोगिता के अधर पर इसे देवफल भी कहा जाता है | केले के पते को बहुत ही पवित्र और लाभदायक माना जाता है | शायद यही कारण है जहाँ हमारे यह कई राज्यों में केले के पते पर रखकर भोजन खाने खिलने का प्रथा है | पकने पर इसमें मिठास आ जाती है परन्तु जल्दी से यह गल भी जाता है | पर इसकी विशेषता यह है की इसमें किसी भी प्रकार का कीड़ा नहीं लगता है | यह स्वयं में एक ऐसा फल है जो बंद और कीटाणु रहित होता है | पकने के बाद केले की उपरी मोटी छाल आसानी से उतर जाती है |
पौष्टिक पदार्थ :- केला वीर्यवर्धक, शुक्रवर्धक है ! नेत्र रोग में लाभदायक है , यह एक शक्तिदायक आहार है | इसे रोटी की जगह खाना चाहिए | केले में स्टार्च और शर्करा अधिक होती है | छोटे बच्चे को दूध में मिलकर दे सकते है | यह कफ व रक्त पित नाशक है |
केले में प्राकृतिक शर्करा, सुक्रोस, फ्रक्टोस, ग्लूकोस एवं रेशा होता है | इसके सेवन से तत्काल उर्जा प्रदान करता है | आधुनिक सहोद से सिद्ध हुआ है की कठोर व्यायाम से खर्च होने वाली उर्जा की पूर्ति दो केले खाकर कर सकते है | इसलिए धावकों की पहली पसंद के रूप में केला ही होती है | कई रोगों में तो इसे पथ्य के रूप में भी प्रयोग किया जाता है | एक केले में 27 ग्राम कार्बोहाईड्रेट मिलता है | एक अछे स्वस्थ्य के लिए नित्य 300 ग्राम कार्बोहाईड्रेट लेने चाहिए |
केले में मुख्यतः विटामिन-ए, विटामिन-सी,थायमिन, राइबो-फ्लेविन, नियासिन तथा अन्य खनिज तत्व होते है | इसमें जल का अंश 64.3 प्रतिशत ,प्रोटीन 1.3 प्रतिशत, कार्बोहाईड्रेट 24.7 प्रतिशत तथा चिकनाई 8.3 प्रतिशत है |
शक्तिवर्धक :- एक गिलास गर्म दूध में एक चम्मच घी, पिशी हुई इलाइची व शहद मिला कर केले खाने के साथ पीने से शरीर शुन्द्र और मोटा होगा | बल, वीर्य, शुक्राणु ,काम-शक्ति और मष्तिस्क शक्त बढ़ेगी | स्त्रियों का प्रदर रोग ठीक होगा | दही में केला और पीसी हुई मिश्री मिलकर खाने से भी मोटापा बढ़ता है |
बलवृद्धि के लिए व्यायाम तथा खेलकूद के बाद केले खाना चाहिए | केले में कार्बोहाईड्रेट प्रयाप्त मात्र में होता है जो सरलता से पाच जाता है , छोटे बच्चे को आसानी से दिया जा सकता है | यह बच्चों के लिए उतम आहार है | इसे मसलकर दूध में मिलकर खिलने से अधिक फायदा होता है | यह खून में वृद्धि करके शरीर की ताकत बढाता है | नित्य केला का सेवन अगर दूध के साथ किया जाय तो तो कुछ ही दिनों में स्वास्थ्य पर अच्छा प्रभाव देखा जा सकता है |
केले को पकाने के लिए इथियन एवं कैल्सियम कार्बाइड रसायन का पानी के घोल में डुबाया जाता है इससे केले पक जाते है | ये रसायन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है और इनसे केले के पौष्टिक तत्व भी नष्ट हो जाते है इसलिए प्राकृतिक तरीके या वर्फ से पकाया ही खाना चाहिए | चितलीदार केला रसायनों से पकाया जाता है | अतः इसे नहीं खाना चाहिए | सदा धोकर ही फल खाना चाहिए, बिना धुले केला या अन्य कोई भी फल हानिकारक हो सकता है |
>पेट की सुजन में केला आसानी से पच जाता है जबकि दुसरे पदार्थ मुश्किल से पचते है |
> टायफाइड तथा अन्य ज्वरों में केले का पथ्य बहुत लाभ देता है |
> आँतों के अल्सर तथा दुसरे रोग हो जाने पर रोजाना 6 से 9 केले खिलाने से लाभ होता है |
> खून की कमी को दूर करता है तथा गले की सुजन में लाभकारी है |
> गाउट रोग में यह मूत्र की यूरिक अम्ल घुलाने की शक्ति बढ़ा देता है |
> केले के पेंड में एक सफ़ेद डंडा होता है | इस डंडे के रस गर्मी के रोग तथा मष्तिष्क - सम्बंधित रोग शांत होते है | कैंसर रोगी के लिए यह औषधि का कार्य करता है |
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आज भी बिमारी मनुष्य के सामने ठीक उसी प्रकार के है जैसे की प्राचीन काल में थे, पर बिमारियों का स्वरूप बदल गया है |बाहरी तौर पर हम अच्छे खासे हष्ट-पुष्ट नजर आते है , तब मालूम पड़ता है बहुत खुशहाल है |परन्तु अन्दुरुनी हालात बहुत कुछ ठीक नहीं होता है | भिन्न-भिन्न प्रकार के बिमारियों से ग्रसित होते है | आज कल का जीवन शैली लोगो को घुट-घट कर मरने के सिवा और कुछ नहीं दे सकता है |
आदते इतनी वाहियात हो गई है कि उसने अपने कुल्हारी से अपनी ही टांगे काट डाला है | उसने अपनी सेहत को इतनी बुरी तरह से तबाह कर डाला है, जैसे की दुनिया में आज से पहले इतनी बुरी सेहत हुई नहीं थी | बीमारियाँ इस कदर दुनिया में फैली हुई है , उतनी बीमारियाँ तो दुनिया के मानचित्र पर , जबसे मनुष्य इस धरती पर पैदा हुआ है, तब से लेकर आजतक नहीं थी | आदमी वर्तमान में इतना कमजोर,बीमार,दुर्बल, रोगी और खोखला हो गया है की इतिहास में ऐसा कभी नहीं था | क्या यह सब मानव सभ्यता के विकाश के कारण है या उनकी बेअक्क्ली ? जरा सोंचे !
मानव शारीर प्रकृति कि एक अनमोल संरचना है | शरीर का विज्ञानं इतना जटिल है, जिस पर सदियों से सम्पूर्ण दुनिया के चिकित्सक शोध कर रहे है | इन्सान चाँद पर तो पैर रख दिए है लेकिन शरीर के विज्ञानं के विषय में केवल कुछ अंश भी समझ पाया है | शरीर की तंदुरुस्ती व आयु से जुड़े विज्ञानं को हम आयुर्विज्ञान अर्थात आयुर्वेद कहते है तथा इससे बने इलाज को आज दुनिया के तमाम बड़े-बड़े देश अपना रहे है |
इन्सान की जिन बिमारियों का इलाज आज की आधुनिक एलोपैथी चिकित्सा में नहीं हो पता, उन्ही लाइलाज बिमारियों का पक्का इलाज आयुर्वेदिक नुस्खों वाली दवाइयों से हो जाता है , जिसका शरीर पर कोई दुष्प्रभाव यानि की side effect भीं नहीं होता, जबकि आज की आधुनिक एलोपैथी चिकित्सा से मनुष्य के रोग थोड़े समय के लिए दब जरुर जाते है लेकिन उसके साथ कई और समस्याएं पैदा हो जाती है | आयुर्वेदिक इलाज में ऐसा नहीं होता क्यूंकि यह इलाज रोग व कमजोरियों को हमेशा के लिए जड़ से खत्म कर देता है |
डायबिटीज को ही अगर लेते है तो वो डॉक्टर जो मरीजों को डायबिटीज के बारे में सलाह देते है , कई खुद रोगी होते है | ऐसा एक डॉक्टर से मैं मिल भी चूका हूँ | करीब पाँच साल से वो टाइप-2 डायबिटीज से पीड़ित है | ऐसा नहीं है की उन्होंने अपना इलाज नहीं कर रहा है परन्तु डायबिटीज की गोलिया बढ़ रही है और ज्यादा कुछ फायदा नहीं हो रहा है |
इस तरह के बिमारियों से बचने के लिए सिर्फ जीवन शैली में परिवर्तन की जरुरत है | अपने शिक्षक स्वयं बने | बीमारी के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानकारी अर्जित करें जो हमेशा ही फायदेमंद साबित होगा | एक जागरूक मरीज ही अपना इलाज पूरी तरह से करबायेगा या हिम्मत अंत तक बनाए रखे |
इस तरह से लाइलाज समझे जाने वाली बीमारियाँ के लिए कारगर औषधियों पर कई शोध हो चुके है | कुछ आयुर्वेदिक वनौषधियों का नाम प्रयोग करके यह देखा गया है की लाइलाज बिमारियों पर इस प्रयोग करने से बहुत ही फायदेमंद हुआ है | ऐसे ही वनौषधियों में से एक है ' एलोवेरा " | यह शरीर के लिए अमृत तुल्य है | हरेक तरह के बीमारियों में इसका प्रयोग फायदेमंद होता है |
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अरे.. दगाबाज थारी बतियाँ कह दूंगी !
जैसे जैसे मौसम का मिजाज बदल रहा है वैसे ही लोगो में परेशानियाँ शुरू होने लगी है | एक तो ठंढ वैसे भी अपने साथ बहुत सारी समस्याएं लेकर आती है जैसे सर्दी-जुकाम,एलर्जी आदि और सबसे बड़ी समस्या उनके साथ होती है जो की साँस की बिमारी से ग्रसित होते है | उनके लिए ये मौसम बहुत ही कष्टदायक होता है | दर्द चाहे नए हो या पुराने इस मौसम में और भी ज्यादा उभर आती है | आज चर्चा करते है दमा के बारे में जो खासकर कड़ाके की ठंढ में बहुत ही ज्यादा घातक सिद्ध होता है |
दमा ( Asthma ) एक साँस की बिमारी है | इस बिमारी में श्वसन नलिका संकुचित हो जाती है जिससे प्रभावित व्यक्ति को सांस लेने में कठिनाई होती है | यह सांस की नली व फेफड़ों में संक्रमण के कारण होता है | साँस की नलियां आगे जाकर पतली हो जाती है इसके अन्दर कार्बन जमा हो जाता है तथा वह अपनी लचक खो देती है |
तरल द्रव फेफड़ों में इकठ्ठा हो जाता है और श्वसन नलिका की श्लेष्मा झिल्ली उद्दीप्त हो जाती है |
इसके कारण फेफड़ों में सुजन भी आ जाती है | यह भी कह सकते है की फेफड़ों में बलगम जम जाता है |
सांस लेने में कोई परेशानी नहीं होती परन्तु साँस छोड़ते समय दम सा घुटने लगता है | छाती में तकलीफ रहती है |
कारण कुछ भी हो सकता है , जैसे किसी कारण एलर्जी, वायु प्रदुषण, कुछ तरह के भोजन आदि से प्रतिक्रियास्वरूप यह दशा भड़क सकती है | दबाब-तनाव, तापमान में परिवर्तन, चिंता और ब्रोंकाइटिस आदि अन्य कारण भी हो सकते है | धुम्रपान, गलत जीवन शैली या विपरीत परिश्थितियों में रहने से भी अस्थमा हो सकता है |
जड़ी बूटी सम्बंधित उपचार आप कर सकते है :-
एलो वेरा जेल / एलो बेरी नेक्टर
जिन्क्गो पलुस
गार्लिक थाइम
बी प्रोपोलिस
इसके साथ हल्का व्यायाम से फेफड़ों में ऑक्सीजन की आपूर्ति को बढ़ने में फायदेमंद हो सकता है |
सुकन पाने के लिए योग करना अच्छा है |
रात को भरी खाना न खाएं | फल और सब्जियां काफी मात्र में ले |
चिकन सूप लाभदायक है | मशरूम, चीज, सोया सॉस और भोजन में सिंथेटिक सामग्री का इस्तेमाल न करें |
चाय या कॉफ़ी का एक प्याला कभी-कभार पिने से दमे का हल्का हमला रोका जा सकता है |
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रामायण में एक अंश मुझे याद आ रहा है जब सुखेन वैद्य ने लक्ष्मण जी का प्राण बचाने के लिए संजीवनी बूटी लाने को कहा - जिससे प्रभु लक्ष्मण का प्राण बचाया गया था | वैसे तो संजीवनी बूटी का नाम सिर्फ सुना ही है किसीने शायद ही देखा हो | चुकी संजीवनी बूटी लाने के समय में स्वयं हनुमान जी भी दुबिधा में पड़ गए थे | जैसा की वैद्य ने कहा था की जिस बूटी के निचे दीपक जल रहा होगा वही असल में संजीवनी बूटी होगा | परन्तु जब हनुमान जी धवलागिरी पर्वत पर गए तो वो आश्चर्यचकित हो गए | उन्होंने देखा यहाँ तो प्रत्येक बूटी के पास दीपक जल रहे है |फिर उन्होंने सम्पूर्ण पहाड़ ही उठा लाये थे |मतलब संजीवनी बूटी को पहचानने में हनुमान जी भी दुबिधा में थे |
अगर वर्तमान समय की संजीवनी बूटी पर चर्चा करें तो यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी की एलो वेरा के पौधे में वो सारे गुण समाहित है जिसे आप संजीवनी बूटी कह सकते है ! एफ.एल.पी के एलो वेरा जेल ने ऐसे कई तरह के चमत्कार कर चुके है जिससे की लोग इसे जड़ी बूटी के श्रृंखला में सर्वोच्च स्थान पर रखते है !
अक्सर लोग मेरे पास सारे इलाज से थके हुए रोगी ही मिलते है,वे अपना कीमती वक्त व धन गवाँ कर जीवन को जैसे तैसे जीने को मजबूर होते है | इतने हताश और परेशान होते है की जब हम किसी और आयुर्वेदिक दवाइयां या पौष्टिक पूरक की बात करते है तो वो सिरे से नकार देते है,यह कहकर की बहुत देख ली साहेब कोई फायदा नहीं होता है बस लोग बेबकूफ बनाते है और अपनी जेब भरते हमारी समस्या वहीं के वहीँ है | इसीलिए कृपया हमें हमारी हाल पर छोड़ दें |
इसमें इसकी क्या गलती ? यहाँ हर गली, चौराहे पर इस तरह के झोला छाप डॉक्टर अपना दुकान खोले बैठे नजर आते है | जहाँ हर तरह के बिमारी का शर्तिया इलाज होता है | बस स्टेंड हो या शौचालय, बड़े-बड़े बैनर -पोस्टर से पटे हुए होते है | कोई न कोई व्यक्ति अक्सर ऐसे निम्-हकीम, वैद्य, बाबाओं के चक्कर में फंसते रहते है | जिसके कारण रोगी के रोग में लाभ होने के वजाय वो और भी अस्वस्थ्य होते चले जाते है |ऐसे हकीमों को कोई फर्क नहीं पड़ता, दुकान यहाँ नहीं चली तो कहीं और खोल देंगे ?
वैसे तो हमारे से भी अक्सर लोग पूछते है सर क्या इस उत्पाद की कोई साय्ड इफेक्ट भी हो सकता है ? यह बात पहले बताइये , आपने तो सारी खूबियाँ गिनती करवा दी हमें इसके दूसरी पहलु के बारे में भी कृपया बताएं ? सवाल इस तरह का आना लाजिमी है क्युकी कई सालों से इलाज का तजुर्बा होता है, कई दवाइयां एक साथ लेना होता है फिर कुछ दिनों के बाद इसी के कारण कोई और परशानियाँ आ जाते है | मैंने कहा - साय्ड इफेक्ट ( दुष्परिणाम) तो बहुत है , सबसे बड़ा साय्ड इफेक्ट एलो वेरा उत्पाद से होता है की आप ठीक हो जायेंगे | और एक दिन आप बिलकुल स्वस्थ्य और खुशहाल जीवन जियेंगे, यही है इसका साय्ड इफेक्ट |
कब्ज़ से लेकर कैंसर तक के मरीजों को एलो वेरा के चमत्कारिक गुणों से फायदा होता रहा है और भविष्य में भी कोई भी असाध्य रोगी अगर इन उत्पादों का प्रयोग श्रधा और विश्वास के साथ सेवन करेगा तो निश्चित ही लाभ मिलेगा |
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आजकल यह कहना अतिशयोक्ति होगी की आयु पर हम विजय पा सकते है | प्राणी की कब मृत्यु हो जाय, कुछ कहा नहीं जा सकता है | हर क्षण मृत्यु के करीब जा रहे प्राणी की आयु शरद ऋतु के बादल के सामान स्वल्प है, यह तो बुझते हुए लौ की दीपक के समान चंचल है, जो गई हुई देखी जाती है |
सबाल यह नहीं है की आपकी कितनी आयु है पर जितनी भी आयु आप जिए वह सुखकर हो, दिन-हिन् और रोगी बनकर जीना बहुत ही कष्ट देता है | मृत्यु के श्रीजन्हार असंख्य रोगों को शरीर में समा देते है और उसे कष्ट दे-देकर मारने की जुगत में लगे रहते है |
ज्यादातर रोग हमारी खुद की गलतियों के परिणाम होते है | स्वास्थ्य का महत्व भी उस समय ज्ञात होता है जब व्यक्ति बीमार होता है | रोग कोई भी हो - कब्ज़ या कैंसर, सभी रोग ख़राब और आयु का क्षीण करने वाले होते है | जो दूरदर्शी लोग होते है वह हर समय सेहत की अहमियत को ध्यान में रखते है और ऐसे कार्य से बचते है जो अंततः रोगकारक बनें |
रोग अपनी शुरुआती दौर में प्रायः घातक नही होते लेकिन बाद में वे जटिल बनते चले जाते है | कब्ज़ जैसा मामूली सा रोग भी हमारी लापरवाही का परिणाम होता है | वैसे कब्ज़ अपनी प्रारम्भिक अवस्था में बिना नुक्सान पहुंचाए सामान्य उपचारों से मिट जाता है लेकिन यदि लापरवाही बरती जाए तब धीरे-धीरे यह अन्य रोगों का कारण भी बन जाता है |
वर्तमान में कैंसर का भी प्रसार बहुत है | सामान्य विकार बिगरते-बिगरते कैंसर में परिवर्तित हो जाते है | इसे मौत का दूसरा नाम भी कह दिया जाता है | कैंसर के मरीज को देखकर एक स्वस्थ्य व्यक्ति के अंदर से यही शब्द निकलते है " हे भगवान मुझे इस बीमारी से बचाए रखना" |
वैसे इश्वर ने हमें वे सुविधाए दे रखी है जिनसे हम रोगों से बचे भी रह सकते है, रोग निवारण भी कर सकते है और दीर्घायु को प्राप्त कर सकते है , लेकिन जानकारी के अभाव में अथवा लापरवाही वश हम इन सुविधाओं का लाभ न उठाकर विज्ञापनबाजी से प्रचारित उन चीजो का ज्यादा इस्तेमाल करते है जो अंततः स्वास्थ्य के लिए घातक ही सिद्ध होती है | कोल्ड्रिंक्स,वर्गर,पिज्जा इत्यादि अनेक उदाहरण आपके सामने है |
बहरहाल यहाँ उस 'कमाल के नुस्खे' को निचे दिया जा रहा है जो बहुत ही साधारण और घरेलु है | तो आपके लिए लीजिये प्रस्तुत है घरेलु परन्तु असरदार नुस्खा :-
तुलसी और पुदीना की सामान मात्रा को मिलकर बनाये गए चूर्ण का नित्य नियमपूर्वक 5 ग्राम मात्रा दिन में एक बार सेवन किया जाए तो कैंसर जैसे भयंकर बीमारी से सदैव बचा जा सकता है | यह नामुराद बिमारी आपसे दूर ही रहेगी |
अगले क्रम में आपसे इस बनौषधि दोनों के मिश्रण के बारे में विस्तृत जानकारी और शोध के विषय के साथ उपस्थित होंगे !
एलोवेरा जेल रोज पिए और स्वस्थ्य तन-मन के साथ सदैव जियें !
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पालक का पौधा अपने देश के प्रायः सभी प्रान्तों में सुलभता व सस्ते में मिल जाता है | इनमे जो गुण है वैसा और किसी शाक में नहीं होता है | ज्यादातर यह शीत ऋतू में पाया जाता है परन्तु कहीं कहीं किसी और ऋतू में भी इनकी खेती की जाती है
स्वाभाव से यह पाचक, तर और ठंढी होती है | पालक में दालचीनी डालने से इसकी ठंढी प्रकृति बदल जाती है | पालक को पकाने से इसके गुण नष्ट नहीं होते है |
इनके गुण और लाभ है :- पालक में विटामिन ए,बी,सी, लोहा, कैल्सियम, अमीनो अम्ल तथा फोलिक अम्ल प्रचुर मात्रा में पाया जाता है | कच्चा पालक खाने में कडवा और खारा लगता है, परन्तु बहुत ही गुणकारी होता है | दही के साथ कच्चे पालक का रायता बहुत ही स्वादिष्ट और गुणकारी होता है | इसलिए गुणों में पालक अन्य सभी शाकों में सर्वोपरि है | इसका रस यदि पिने में अच्छा न लगे तो इसके रस में आंटा गुंथकर रोटी बनाकर खाने चाहिए | पालक रक्त में लाल कण बढाता है | कब्ज़ दूर करता है | पालक, दाल व अन्य सब्जियों के साथ खायें |
पालक का रस सम्पूर्ण पाचन -तंत्र की प्रणाली ( पेट,छोटी-बड़ी आंतें ) के लिए सफाई-कारक एवं पोषण-कर्ता है | कच्चे पालक के रस में प्रकृति ने हर प्रकार के शुद्धिकारक तत्व रखे है | पालक संक्रामक रोग तथा विषाक्त कीटाणुओं से उत्पन्न रोगों से रक्षा करता है | इसमें विटामिन 'ए' पाया जाता है जो म्यूक्स मेम्ब्रेन्स की सुरक्षा के लिए उपयोगी है |
रोगों में हितकर पालक :-
बाल गिरना :- इसमें पाया जाने वाला विटामिन 'ए' विशेष मात्र में होता है जो बालों के लिए अत्यंत जरुरी होता है | जिसके बाल झाड़ता हो ,वो कच्चे पालक का सेवन करें |
दम, खांसी, गले की जलन,फेफड़ों की सुजन और यक्ष्मा हो तो
पालक के रस के कुल्ले करने से लाभ होता है | इसके साथ ही दो चम्मच मेथी कुथ्कर दो कप पानी में तेज उबालते हुए एक कप पानी रहने पर छानकर इसमें एक कप पालक का रस और स्वादानुसार शहद मिलाकर नित्य दो बार पिने से इन सभी रोगों में लाभ होता है | फेफड़ों को शक्ति मिलती है | बलगम पतला होकर बाहर निकल जाता है |
रक्तविकार और शरीर की खुश्की व रक्तक्षीणता :- आधे गिलास पालक के रस में दो चम्मच शहद मिलाकर 50 दिन पियें | शरीर में इससे रक्त की वृद्धि होगी | गर्भिणी स्त्रियों में इससे लोहे ( आयरन ) की पूर्ति होती है |
यदि प्रतिदिन पालक का रस नित्य 3 बार 125 ग्राम की मात्रा में लिया जाय तो समस्त विकार दूर होकर चेहरे पर लालिमा, शरीर में स्फूर्ति, उत्साह एवं शक्ति का संचार, रक्तभ्रमण तेजी से होता है | निरंतर सेवन से चेहरे के रंग में निखार आ जाता है | रक्त बढ़ता है | इसका रस, कच्चे पते या छिलके सहित मुंग की दाल में पालक की पतियाँ डालकर सब्जी खानी चाहिए | यह रक्त साफ़ और बलयुक्त करता है |
पायोरिया :- पालक का रस दांतों और मसुधों को मजबूत बानाता है | रोगी को कच्चा पालक दांतों से चबाकर खाना चाहिए | प्रातः भूखे पेट पालक का रस पिने से पायोरिया ठीक हो जाता है | इसमें गाजर का रस मिलाने से मसुधों से रक्तस्त्राव होना बंद हो जाता है |
नेत्रज्योति पालक का रस पिने से बढती है |
पथरी :- कई लोग यह मानते है की पालक खाने से पथरी होती है, लेकिन यह निश्चित समझ ले की कच्चे पालक के रस के सेवन करने सा कदापि पथरी नहीं होती |
पालक में ऑक्जेलिक अम्ल पाया जाता है जो पानी में घुल जाता है | पालक में कैल्सियम और फोस्फोरस होता है जो मिलकर कैल्सियम फोस्फेट बनाता है जो पानी में घुलता नहीं है जिससे पथरी बन जाती है | इसलिए पथरी के रोगीओं के केवल पालक की सब्जी नहीं खाना चाहिए | पालक और हरी पते वाली मेथी मिलाकर साग बनाकर खाने से पथरी नहीं बनती है |
अतः पालक खाए शरीर में खून बढ़ाये |
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