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Mar 16, 2014

केजरीवाल का काला सच ??

आम आदमी के संजोयक केजरीवाल आज ऐसे मेहमान ढूंढ रहे है जो इनके साथ बैठकर दस हजार, बीस हजार रुपैये का खाना खा सके ! इस राजनीती में आम आदमी कहाँ बचा है ? केजरीवाल के राजनीती का ये काला चेहरा है जो लोगों के सामने आ रहा है ! दिल्ली की चुनाव जितने के बाद केजरीवाल ने कहा जीत किसकी हुई है - यह आम आदमी की जीत है , जनता बिच में जायेंगे और उनकी सेवा करेंगे !

वो केजरीवाल कहाँ खो गया ? चुनाव से पहले नागपुर के चमचमाते होटल में जब हजारी प्लेट बिछाई जायेगी तो केजरीवाल का विश्वास उन पाखंड के सामने सर झुकाये खड़ा होगा ! आम आदमी की राजनीती जब रईस के रुपैया खरीद लेगा तो परिवर्तन कि बुनयाद हिल नहीं रही होगी ये सबाल परेशान तो करेगा ही ! क्या अरविन्द केजरीवाल दस रुपैये में मिटने वाली भूख पर प्रीमियम वसूलने का फैसल क्या है वो भी हजार से दो हजार गुना ? और जब ये फैसला कर लेते है तो वो यकीन अपनी मौत मर लेते है की आम आदमी की अठन्नीयाँ भी एक आदर्श राजनीती के रस्ते खोल सकते है ! दस हजार का रात्रिभोज उस रिक्से वाले का चंदा मिटा नहीं देगा ? क्या केजरीवाल इस बात का जबाब देंगे की करोड़पतियों की ये जमात बिना अपनी फायदे की उम्मीद के उनके साथ दस हजार का डिनर क्यों करेगी ?

क्या केजरीवाल को बताना नहीं चाहिए कि जब ताकत आम आदमी का है तो रुपैये खास आदमी का क्यों चाहिए ? क्या केजरीवाल ने अब स्वीकार कर लिया है की रुपैये के अम्बार के बिना राजनीती नहीं बदल सकती ? यह सबाल तो बनता है की जिस जनता ने केजरीवाल कि एक पुकार पर उनकी तिजौरी में इतना रुपैया भर दिया था की उन्हें मना करना पड़े , उसी जनता पर उन्होंने फिर से भरोसा क्यों नहीं किया ? क्या केजरीवाल को वाकई आम आदमी पर भरोसा नहीं रहा या फिर आम आदमी को केजरीवाल पर भरोसा नहीं रहा ?

क्या केजरीवाल को अपनी राजनीती से ज्यादा रईस लोगो पर भरोसा हो चला है ? या फिर उन्होंने मान लिया है की राजनीती में रुपैया नहीं तो कुछ भी नहीं ! अगर केजरीवाल को इसी तरह से रुपैये जुटाने थे तो सितारा होटल के कैंडल लाइट डिनर के वजाय शहर के मैदान में चटाई बिछाकर चुनाव का खर्च निकाल सकते थे ! अब यह सबाल तो बनता है की केजरीवाल ने आम आदमी के बीच पचास रुपैये की थाली क्यों नहीं बेचीं और क्या गारेंटी है की आज दस हजार की थाली बेचने बाल कल लाखो की थाली नहीं बेचेंगे और आगे करोड़ों की चन्दा नहीं लेंगे ?

पार्टी का जो मूल मुद्दा था वो कहीं ग़ुम सा हो गया है जैसे भ्रष्टाचार, सुराज्य सुशाशन ये सब कही गायब सा हो गया है ! वास्तव में केजरीवाल का सियासत बुनियादी विश्वास व सहयोग की राजनति थी परन्तु उनके डिनर ने उनकी सोच को भी संकीर्ण किया है ! और उनसे ज्यादा सिमटा हुआ है उनका आत्मविश्वास की सिर्फ सही होने के दम पर सियासत के सामानांतर लकीरे खिची जा सकती है क्योंकि रोटी के पहले कौर के साथ ही रईसों का यह गरूर सातवे आसमान पर पहुच चूका होगा कि राजनीती उनके रुपैये से चलती है ,जिसके खिलाप लड़ने के लिए चौराहो ने केजरीवाल को चमत्कार का सारथी बनाया था !

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Feb 21, 2014

"जान बचे तो लाख उपाय, लौट के झूठे घर को आय "

दरअसल आम आदमी पार्टी की राजनीतिक नीव ही झूठे व लोक लुभावने वायदे से हुई ,जो तर्कसंगत नहीं थे ! आम लोगों की धरना थी की टीम केजरीवाल अन्य पार्टी से अलग काम करेंगे ! जैसा की उन्होंने अपनी एजेण्डे में शामिल किया था ! आम आदमी पार्टी की उम्मीद से कहीं ज्यादा राज्य चुनाव में जीत हासिल की ,अप्रत्यासित जीत के बाबजूद उन्हें बहुमत नहीं मिली परन्तु बिना शर्त काँग्रेस ने समर्थन दिया , फिर रायसुमारी जनता के बिच और ना जाने क्या क्या ड्रामेबाजी किये गए अंततः केजरीवाल साहेब ने जनता पर अपना अहसान जताया और मुख्यमंत्री बनने पर राजी हो गए ! सरकार बनाने और चलाने के प्रति केजरीवाल साहेब शुरू से ही गम्भीर नहीं रहे ! सरकार बनाने का कार्य तो अनिशिचितता से हुई पर उनके काम करने का तौर तरीके से अंत जल्द होगी ये जरुर निश्चित थी !

उनकी छटपटाहट , हरबराहट में लिए गए तमाम फैसले केजरीवाल के मनसा पर प्रश्नचिन्ह उठ रही है ! क्या वो वाकई दिल्ली के लिए कुछ करना चाहते थे ? क्या वो कार्य पूरा कर लिए जिसके लिए आम जनता ने उन्हें हाथो-हाथ लिया था ? बिजली -पानी ,महिला सुरक्षा,शिक्षा ,रैनबसेरा इत्यादि अनेक प्रकार के समस्याएँ से जूझती दिल्ली को क्या निदान हो गया ?

>क्या वाकई लोकपाल ही दिल्ली की सबसे बड़ी समस्या थी ? अरे केजरीवाल जी अगर भ्रष्टाचार के विषय से आप वाकई चिंतित थे तो सबसे पहले निचले स्तर से काम करते , जैसे राशन कार्ड जो दिल्ली वालो के लिए सबसे बड़ी समस्या है , राशन दुकान और राशन कार्ड के लिए कभी आप धरना पर बैठते तो शायद दिल्ली के लोगो को भी लगता की वाकई आप कुछ करना चाहते है ! निचले स्तर पर आज भी गरीब लोगो के लिए दो जून की रोटी पर भी मुसीबत हो रही है !

लेकिन आप की छटपटाहट तो शुरू से ही भागने के लिए था ! तंग मानसिकता के परिचायक तब बने जब दो पुलिस वाले को छूटी भेजने के लिए अपने दल बल के साथ धरना पर बैठ गए ! गणतंत्र दिवस पर आपकी टिपण्णी भी आपकी दिमागी दिबलियापन नहीं तो और क्या था ? डेढ़ महीने में आपने हमेशा लाइट कैमरा और एक्शन वाले काम किया है ! काम हो न हो ढोल पीटने वालों को साथ में पहले से लेकर चलते थे !

क्या टीम केजरीवाल बतायगा की सिमरत ली अमेरिकन ( CIA ) एजेंट अरविन्द केजरीवाल और मनीष सिसोदिया के NGO कबीर में साल 2010 में 4 महीने के लिए काम किया था और उसी दौरान अमेरिका से 86 लाख रुपैये का अनुदान राशि भी मिली थी ! ऐसा क्या काम किया था जिसके बदले उन्होंने अमेरिका से इतनी बड़ी धन राशि मिली थी ! केंद्र सरकार ने कई बार चिट्ठी लिखी है पर ये लोग अभी तक जबाब नहीं दिया है ! आखिर माजरा क्या है ?

भ्रष्टाचार के खिलाप ढोल पीटने वाले ढोली अपनी करतूत क्यों नहीं साफ करती है ? अभी हाल ही हर्षवर्धन जी भी सबाल उठाये है फिर वो मौन क्यों है ? बस दुसरो के बारे में अनाप-सनाप बाते करना ही उनका एक मकसद है ! पर जब खुद ही भ्रष्टाचार के दल-दल में ऊपर से निचे तक फंसा हो तो औरो को भी ऐसा ही समझते है ! एक कहाबत है न " चोरक ध्यान मोटरिये पर " ! जो चोर होते है वो सबको चोर ही समझते है !

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Jan 21, 2014

केजरीवाल का कुचक्र , लुटिया डुबोने पर उतारू !

लगता है दिल्ली की राजनीती में जैसे कबड्डी मैच चल रही हो ! एक तरफ टीम केजरीवाल जो आम आदमी पार्टी के संस्थापक और वर्त्तमान मुख्य मंत्री जी है और सामने प्रतिद्विंदी दिल्ली की पुलिस है और रेफरी यहाँ के केंद्रीय गृह मंत्री सुशिल कुमार शिंदे है ! मैच का परिणाम चाहे जो भी हो जनता की हार हर हाल में सुनिश्चित नजर आ रही है ! जनता अब क्या करें? कहाँ जाएँ ? अपनी दुखड़ा किसके पास लेकर जाये? क्योंकि केजरीवाल जी भूल चुके है की वही यहाँ के मुख्यमंत्री है ! परन्तु व्यवस्था परिवर्तन के नाम पर अनायास आन्दोलन की कोई खास जरुरत यहाँ नजर नहीं आ रही है ? पहले यहाँ के जनता से किये हुए वायदे को पूरा कर लेते इसके बाद जो आन्दोलन का कीड़ा उनके अंदर है वो भी पूरा कर लेते ! इन सब आपाधापी में जनता बिचारी अपनी भाग्य को कोश रही है की क्या हमने इन्हे सिर्फ रोड छाप राजनीती करने के लिए वोट दिया है या सचिवालय में बैठ कर भी कोई नेक काम जो जनता के हक़ में हो उसकी लड़ाई लड़ी जा सकती है ?

दिल्ली की नव निर्वाचित सरकार जिस प्रकार अपना सचिवालय चौराहे पर लगा रखी है यहाँ तक की कुछ जरुरी कागजाते भी वहीँ पर हस्ताक्षरित किये जाते नजर आ रहे थे ! उससे दिल्ली कि अंतराष्ट्रीय पटल पर केजरीवाल साहेब क्या सन्देश देना चाहती है ? क्या यह देश और सचिवालय जैसे प्रतिष्ठित संस्था की गरिमा के साथ छेड़छाड़ नहीं है ? और तो और आजकल उनकी भाषा भी अनपढ़ और सामयवादी लम्पटवाद जैसे हो रही है ! मानसिक स्थिति जैसे असंतुलित हो गया हो, कुछ भी बोल रहे है ? मुख्यमंत्री जी शिंदे को नहीं पहचानते, और वो कहते है कौन होता है शिंदे मुझे बताने वाले कि मैं कहाँ धरना पर बैठूं , मैं दिल्ली का मुख्यमंत्री हूँ मेरी मर्जी कहीं भी बैठ सकता हूँ , मैं बता सकता हु कि शिंदे को कहाँ बैठना है ? अब यह कितना मर्यादित और संयमित भाषा है हमारे आम आदमी पार्टी की आप ही निष्कर्ष निकाले !

केजरीवाल साहेब को एक बात और मान लेनी चाहिए की "काठ की हांडी बार बार नहीं चढ़ा सकते है " और हाँ महोदय जनता बिलकुल जागरूक है जैसा कि आप जानते है ! आप के लाइट एक्सन और मिडिया प्रेम भी अच्छी तरह से समझने लगे है ! अगर अपनी औकात में समय से पहले आ जाये तो बेहतर होगा वर्ना आम आदमी की ताकत भला आप से अच्छा और कौन जान सकता है ? वो जब सर आँखों बिठा सकता है तो जमीं पर पटकने में भी उन्हें जायदा वक्त नहीं लगेगा !

आम आदमी पार्टी अब आम आदमी के लिए अभिशाप साबित होने लगा है ! आज के तारीख में दिल्ली वासियों के लिए सबसे बड़ी मुसीबत अगर कोई है तो वो है आम आदमी पार्टी और उनके मुखिया अरविन्द केजरीवाल, जो अनरगल कार्यों और अपने आप को मीडियामय करने के लिए तरह तरह के ड्रामा करने में लगे रहते है !

अपने घरों में खुद आग लगाकर हाथ सेक रहे है और दूसरे लोगों के बारे में बड़ी बड़ी बाते कर रहे है ! जब घर मुखिया को कोई फिर्क नहीं हो तो दूसरा कोई क्यों चिंता करने लगे ?मुख्यमंत्री जी दिल्ली की महिला सुरक्षा को लेकर इतना सख्त है ये पता नहीं था ? जहाँ उनकी रिहायश है, जो उत्तरप्रदेश मे है क्या वो महिला सुरक्षा के दृष्टिकोण से बिलकुल सुरक्षित है ? धरना अब उत्तरप्रदेश में भी तयारी करनी चाहिए ! " करना न धरना , सिर्फ करते रहो धरना "

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Dec 25, 2013

सकारात्मक व रचनात्मक राजनीति आम आदमी की प्राथमिकता हो तो बेहतर ?

तक़रीबन दो हप्ते से चल रही ड्रामा अब क्लाइमेक्स तक पहुँच चुकी है ! कल हाई वोल्टेज ड्रामा आम आदमी पार्टी के अंदर भी देखा गया ! दिल्ली की जनता को शायद इस तरह का ड्रामा कि उम्मीद कम से कम आम आदमी पार्टी के विधायक से नहीं थी ! परन्तु मंत्री पद नहीं मिलने के कारण विनोद कुमार बिन्नी ने जिस तरह से अपना तेवर दिखा कर मीटिंग से भागे बहुत ही दुर्भाग्य पूर्ण और आम आदमी पार्टी पर एक दाग जरुर लगा दिया ! अब चाहे इसके लिए AAP के लोग कोई भी सफाई दे परन्तु जो कुछ भी हुआ इससे यह साबित हो जाती है कि AAP के भी अंदर सबकुछ ठीक नहीं है !

ईमानदारी और नैतिकता की ढिंढोड़ा पीटने वाले AAP के विधायक की कलय खुल गई ! महत्तवकांक्षा व वर्चस्वता जीत कर आये हुए सभी विधायक में होगी ! "AAP" के विधायक भी इन्ही धरती पर पले बढे हुए है , इन्होने भी यही के वातावरण में साँस ली है ! तो वो यहाँ के आबोहवा से अछूता कहाँ रह पायेगा ! इनकी भी जरूरते है , खुद भी समस्या होगी और सबसे बड़ी बात है की जब तक खुद समस्या में घिरी होगी तबतक औरों को कहाँ से समस्या से मुक्त करने का सोचेगा ! AAP के लोग कोई देव लोक से धरती पर नहीं अवतरित हुए है ,जो लोभ , मोह,अर्थ,काम ,वासना इत्यादि से मुक्त हो !

एक लाइन मैंने कभी पढ़ा था , आज जरुर यहाँ रखना चाहूंगा :-

" मंच जबसे अर्थदायक बन गए है , तोतला भी गीत गायक बन गए है ! राजनीती इस कदर गिरने लगी है , जेबकतड़े भी विधायक बन गए है !"

मेरी "आप" के लोगों से गुजारिश होगी कि सरकार बनाने के बाद जो बुनियादी मसला है जैसे बिजली व पानी कि समस्या को प्राथमिकता दे फिर जो भी कानून बनाना चाहते है वो बनाये और जरुर लोगो को साफ सुथड़ी व भयमुक्त,भ्रष्टाचार मुक्त दिल्ली ही नहीं बल्कि पूरा भारत को बनाये ! स्वागत योग्य होगा अगर आम आदमी पार्टी सकारात्मक व रचनात्मक तरीके से किये हुए वायदे को पूरा करती है ! AAP को सरकार बनाने के लिए बहुत बहुत बधाई !

प्रतिशोध की राजनीती फ़िलहाल AAP के लिए खाई खोदने के सामान होगा ! जिससे पार्टी कि छवि ख़राब होगी व लोगो में गलत सन्देश जायेगा कि वो अपने किये हुए वायदे पूरा नहीं कर पाते इसलिए इस तरह का ड्रामा किया है ! आम जनता यही सोचेगी कि बड़ी बड़ी किताबी बाते सुनने में बहुत अच्छी लगती है पर क्या वाकई इन बातों को अमल में लाना मुश्किल काम है ? आपकी राय जानना जरुर चाहुगा !

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Dec 21, 2013

"आम आदमी पार्टी " की वायदे और इरादे !

आम आदमी पार्टी की मनोदशा आज ठीक उस कहाबत को सपष्ट करती है जैसे " अधजल गगरी छलकत जाय" ! अरविन्द केजरीवाल और उनके टीम खुद के बनाये गए चक्रब्यूह में उलझते जा रहे है ! अमर्यादित भाषा का प्रयोग तो जैसे उनकी रोजमर्रा की बात हो गई है ! आम आदमी पार्टी के लोगों से दिल्ली की जनता कम से कम दूसरे नेता से जरुर अलग सोच रखते है ! लेकिन कुमार विस्वास जिस तरह से उजुल-फिजूल व्यानबाजी करते है उनसे तो यही लगता है कि "AAP" सरकार बनाने से बचना चाहते है !

क्यों नौटंकी करके आम जनता को बेबकूफ बनाना चाहती है ? केजरीवाल जी को समझना चाहिए कि वो वही जनता है जिन्होंने कोंग्रेस और भाजपा जैसे दोनों पार्टी से खपा होकर आपको बहुतमत के करीब लाया है और चाहती है कि सरकार बनाकर अपना दम दिखाए , फिर जो आपने लोगों को सपना दिखाए है उन्हें पूरा करें ! जब समय आ गया है तो कभी SMS-SMS का खेल खेल रहे है तो कभी नुक्कड़ नाटक का सहारा लेकर फैसला लेने का ढिंढोड़ा पिट कर अपनी राजनितिक अपरिपक्ता का परिचय देकर स्वयं को फजीहत करा रहे है !

श्री मान केजरीवाल जी जनता ने आपको अपना मत "आप" के पक्ष में दे दिया है ! आप को जनमत का सम्मान करते हुए अपने किये हुए वायदे अपनी मजबूत इरादे से करना चाहिए ! परन्तु रोज आप नए तरह फालतू नौटंकी से जनता को उलझाने व बेब्कुफ़ बनाने का प्रयास करते है !

अगर जनता "आप" जैसे नौसिखिये को सर आँखों पर बिठा सकती है तो धूल चटाने में भी जरा सा वक़्त नहीं लगेगा ! आज की परिस्थिति में सोचने के बदले "आप " लोकसभा चुनाव के बारे में सोच रहे है ! यही जनता तब भी होंगे श्री मान जी फिर आपकी मानसिकता को समझ चुके होंगे कि आप कितने अवसरवादी है ? और फिर क्या फर्क रहा "AAP", कोंग्रेस व बीजेपी में ? आपका भी नाम अवसरवादी के सूचि में हो जायेगा ! आप से लोगो से अपेक्षा यही है की नौटंकी ना करे और ध्यान अपने किये गए वायदे पर केंद्रित कर लोगों के उम्मीदों पर खरे उतरें !

अंत में एक बात और जरुर रखना चाहूंगा कि "जनमत संग्रह और लोगों कि रायसुमारी "पर ज्यादा उछलने का प्रयास ना करें ! कारण यह है कि अगर 80 प्रतिशत जनता का मत "आप" के यानि सरकार बनाने के पक्ष में है तो वो आपके विरोधी है और वो आपको जांचना व परखना चाहते है और असल में वो जनता आपका है या आपके साथ है जो सरकार नहीं बनाने के बारे में राय रखते है ! तो महाशय शुभचिंतक की संख्या धीरे धीरे आपके नौटंकी से खपा होकर दिनानुदिन घटती जा रही है ,इसके लिए आपको यानि कि टीम केजरीवाल को चिंता होनी चाहिए ! हमारी सहानुभूति आपके साथ रहेगी , ईशवर आपको सद्बुद्धि दे !

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Dec 13, 2011

महाराष्ट्र में अण्णा की आँधी की हवा हवाई !!


सियासी इलाके में महाराष्ट्र नगरपालिका व नगर परिषद चुनाव परिणाम के जो कयास लगाये जा रहे थे उसका बिलकुल उल्टा ही हुआ ! मतलब अण्णा ने खुलकर एन.सी.पी. और उनके मुखिया शरद पवार का निकाय चुनाव में विरोध किया था , परन्तु अण्णा की आंधी बस हवा हवाई नजर आई ! हैरतअंगेज तरीके से एनसीपी अब तक आए नतीजों यानि 177 नगरपालिका सीटों में नंबर वन पार्टी बनकर उभरी है जबकि कांग्रेस उसके पीछे यानि दूसरे नंबर पर है। जबकि बीजेपी और शिवसेना को तीसरे नंबर से संतोष करना पड़ा।

आशा थी की केंद्र सरकार में गठबंधन व अण्णा की आँधी, किसानों का आन्दोलन , भ्रष्टाचार के मुद्दा शायद एन.सी.पी पर भरी पड़ेंगे परन्तु थप्पड़ कांड के बाद उनकी पार्टी निकाय चुनाव में और भी मजबूत हुई है ! ग्रामीण इलाके में उनकी पैठ और भी मजबूत होती नजर आ रही है ! नगरपरिषद की कई सीटों पर कांग्रेस और एनसीपी ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था। इसके बावजूद दोनों पार्टियां मजबूत होकर उभरीं।


मतलब कांग्रेस व एन.सी.पी. ने महाराष्ट्र चुनाव में अपना लोहा मनवा लिया है यानि विरोधियों को धुल चटा दिया ! यह चुनाव अण्णा बनाम एन.सी.पी. व कांग्रेस थी ! अण्णा की अन्नागिरी अपने ही गढ़ पुणे व अहमदनगर में भी बिलकुल बेअसर नजर आई !

हालांकि इन नतीजों से सबसे ज्यादा कोई मायूस नजर आया तो वो हैं राज ठाकरे। कई नगरपालिकाओं में तो उनकी पार्टी खाता भी नहीं खोल सकी। मायूस होने का वक्त न सिर्फ राज ठाकरे को है बल्कि शिव सेना व बी.जे.पी को सोचने का प्रयास करना चाहिए ! ये नतीजा विरोधियों के लिए सोचने पर मजबूर कर दिया है !


इस तरह के परिणाम की उम्मीद शायद ही अण्णा जी सोचे होंगे ! अब क्या कहना चाहेंगे अण्णा जी ? क्या वहां के जनता मुर्ख है ? उन्हें अण्णा व शरद पवार के बारे में जानकारी नहीं है ? आजकल के वयानबाजी के मुताबिक अण्णा जी जो चाहेंगे वही होगा ! परन्तु यह नतीजा शायद उनके भ्रम को बदल सकने के लिए काफी है ! जब घर के लोगों को अण्णा ने नहीं समझा पाए तो क्या खाक समझायेंगे देश के 125 करोड़ को !

सर्वप्रथम उन्हें खुद को समझने का प्रयास करना चाहिए ! हम सुधरेंगे, जग सुधरेगा ! मन में राम, बगल में छुरी ! घर में भ्रष्ट लोगों के बारे में जब बोलने की बारी आती है तो आज के पीढ़ी की गाँधी जी मौन ब्रत रख लेते है ! यह वही मॉडर्न गाँधी है जिन्होंने महाराष्ट्र में हुई पूर्वोत्तर राज्य से आये हुए परीक्षार्थी पर हुए एम्.एन.एस. यानि राज ठाकरे के गुंडे द्वारा हमले पर उनकी पुरजोर तारीफ की थी ! कहा था शाबाश, बहुत अच्छे यह है सच्ची राज्य भक्ति !

मराठा मानुष के नाम पर राजनीती करने वाले सरेआम गुंडागर्दी करते रहे परन्तु वो वजाय की उन्हें रोकते उनकी प्रसंशा की ! सिर्फ गाँधी जी के तस्वीर के समक्ष " वैष्णव जन को तेने कहिये जी पीर पराये जाने न " भजन करके गाँधी नहीं बना जा सकता है ! आचरण सर्वोपरि होनी चाहिए !

"वाह रे गाँधी क्या है तेरी आँधी
आया था लंगोट में बस गया हजार के नोट में !!
गैर सरकारी संस्था (Non-Goverment Organization ) को लोकपाल में नहीं रखने के पीछे क्या मनसा है ? क्या इससे किरण वेदी व अरविन्द कजरीवाल जैसे न जाने कितने एन.जी.ओ. में घोटाला पर पर्दा नहीं डाला जा रहा है ? आखिर एन.जी.ओ. को क्यों नहीं लोकपाल में लाना चाहते अण्णा जी ? कोई बताएगा ?

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