खुबसूरत आँखों के बारे में तारीफ सुनना किसे नहीं अच्छा लगता है | अगर कोई आपके आँखों के बारे में कहे -------- तेरे आँखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है ? तन और मन दोनों प्रसन्नचित हो उठता है |
आँख शरीर का ऐसा अंग है जिसे प्रकृति ने उसकी रचना द्वारा स्वयं उसे संरक्षण प्रदान किया है | आँख शरीर का सबसे महत्वपूर्ण अंग है जिसके बिना दुनिया का सारे सुख और सौन्दर्य अर्थहीन लगता है | यह प्रकृति का सर्वोत्तम व खुबसूरत तोहफा है | नेत्र है तो हम दुनिया के आसपास की रंगीनी को देख पाते है वर्ना चरों और अँधेरा ही अँधेरा |
आँखों को एक हड्डी के खंड में रखा गया है ताकि वह बहरी धुंए, धुल, प्रदुषण, दुर्घटनाओं, आदि से सुरक्षित रहे | इसके सुरक्षा के लिए कुछ उपयोगी बाते पर ध्यान देना अतिअवाश्यक है | क्यूंकि आधुनिक जीवनशैली का प्रभाव आँखों पर पड़ता है | अत्यधिक श्रम, चिंता, और तनाव से आँखे विकारग्रस्त हो जाती है | नींद की कमी, थकान, अधिक काम लेना, फिल्म या टीवी को बहूत पास से देखना , तेज प्रकाश या हवा में आँखे खुली रखना ,आँखों की सफाई पर ध्यान नहीं देना आदि कारणों से आँखें व्याधियों कीशिकार हो जाते है |
आँखों की देखभाल व रखरखाव रखरखाव के लिए जरुरी है आपके भोजन में पोष्टिक तत्व की मौजूदगी ,नियमित रूप से आँखों की जांच करनी चाहिए |
प्रत्येक व्यक्ति को 40 साल की उम्र के उपरांत मधुमेह की जांच अवश्य करना चाहिए ,क्यूंकि मधुमेह के प्रभाव से शरीर के अन्य अंगों के साथ आँखों को भी दुष्प्रभावित कर सकता है | आँखों की पोष्टिकता प्रदान करने हेतु विटामिन ए युक्त आहार जैसे हरी पतीदार सब्जियां, पालक, टमाटर, गाजर,कद्दू, पपीता, आंवला, आम आदि का सेवन करना अति आवश्यक है |
आज कल गर्मी का आलम यह है की १० बजे के बाद ही घर से निकलना मुश्किल लगता है | आँखों में तेज जलन सा महसूस होता है | इस मौसम के तेज गर्मियों में तवचा के साथ -साथ आँखों पर भी बहूत गहरा प्रभाव डालता है | यही वो मौसम है जब आग उगलता सूरज अपनी तपन से तन जो झुलसाने में कोई कसार बाकि नहीं छोड़ता, ऐसे में आँखों की सुरक्षा बेहद जरुरी है गर्मियों के मौसम में हम अपनी त्वचा को तो ध्यान रखते है लेकिन आँखों को भूल जाते है | ऐसे मौसम में आँखों में वायरल संक्रमण होने के खतरा ज्यादा रहता है | बैक्टेरिया , वायरस और दूसरी एलार्गी गर्मी में पनपती है जो आँखों को अपना शिकार बना सकती है |
अगर ऐसा महसूर हो तो फ़ौरन डॉक्टर की सलाह लें |
संक्रमण से बचने के उपाय :-
हाथों को हमेशा साफ़ रखें | धुप चश्मे आपको सिर्फ धुप से नहीं ,बल्कि धुंएँ और गंदगी से होने वाली एलर्जी से भी बचाते है |
कोन्टक्ट लेंस को अच्छे से साफ़ करके उपयोग करें |
गर्मी के कारण आंखे लाल होने पर ठंढे पानी से आँख साफ करके थोड़ी देर के लिए आँखे बंद करके बैठे |
सुबह सूर्योदय से पहले उठे और उठते ही मुह में पानी भरकर बंद आँखों अपर २०-२५ बार ठंढे पानी के छीटे मारे | याद रखे, मुह पर छीटे मरते समय या चेहरे को पानी से धोते समय मुह में पानी भरा हो |
धुप , गर्मी\या श्रम के प्रभाव से शरीर गर्म हो तो चेहरे पर ठंढा पानी न डाले |
थोडा विश्राम पर पसीना सुखाकर और शरीर का तापमान सामान्य करके ही चेहरा धोएं |
आँखों को गर्म पानी से न धोएं | देर रात तक जागना और सूर्योदय के बाद देर तक सोना आँखों के लिए हानिकारक होता है | देर रत तक जागना ही पड़े तो घंटे-आधे घंटे में एक गिलास पानी पी लेना चाहिए |
हमारे पास इससे बचने के लिए विश्व प्रसिद्ध पौष्टिक पूरक है जिसके उपयोग से आँखों का पोषण होगा | इस लिए अपने आहार में इस पौष्टिक पूरक का समावेश करें | जिनमे नेत्र शक्ति बने रखने के लिए आवश्यक विटामिन ए प्रयाप्त मात्र में उपलब्ध रहता है | आप इस तरह से अपने आँखों की समस्या से निजात पा सकते है |
पौष्टिक पूरक जो आँखों के लिए अति आवश्यक है जिसका विवरण निचे दिया जा रहा है :--
१. एलो बीट'स न पिचेज विटामिन ए से भरपूर है जो आँखों के पोषक के लिए जरुरी है
२. फोरेवर विजन इसमें मौजूद गुण आपके आँखों को सदा जवान बने रखेगा |
३. एलो एक्टिवेटर इससे आँखों में दो बूंद डालकर प्रदूषित दृष्टिपटल को सुरक्षित रख सकते है |
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आजकल लोग मल्टीविटामिन्स की गोलियां बाजार से बिना कुछ सोचे समझे अपने सेहत को चुस्त-दुरुस्त रखने के लिए उपयोग कर रहे है | पर अगर आप यह सोचकर मल्टीविटामिन्स गोलियां ले रहे है की इनसे कोई आपका फायदा होगा तो आप कुछ और नहीं बल्कि अपने बक्त के साथ-साथ पैसे व सेहत दोनों का नुकसान कर रहे है |
एक प्रसिद्ध न्यूट्रीसन के मुताबिक , हर साल 4838 करोड़ रूपये उगाही करने वाली ऐसी कम्पनी लोगों के पैसे लुट रही है |मसलन कुछ मामले में तो यह लेना खतरनाक भी हो सकता है |अगर जो लोग मछली का तेल लेने के आलावा मल्टीविटामिन्स भी ले रहे है तो आने वाला समय में उनकी हड्डियाँ कमजोर पर सकती है क्यूंकि वो जरुरत से ज्यादा विटामिन-ए ले रहे है |
स्वास्थ्य को लेकर आप चाहे कितने भी जागरूक क्यूँ न हो पर ऐसी सप्लीमेंट दवाइयां बिना किसी डॉक्टर या मेडिकल एक्सपर्ट के राय से नहीं लेनी चाहिए | कई लोग ऐसी दवाइयां सिर्फ इस लिए ले लेते है की वे अपनी सेहत को लेकर बेहद चिंतित और सावधान रहते है | वे इन्हें लेने से पहले यह नहीं सोचते की वे क्यूँ ले रहे है ,कितनी मात्रा में लेनी चाहिए या लेनी भी चाहिए या नहीं |
औसतन हमारे आहार से ही प्रयाप्त विटामिन -सी मिल जाती है और अगर इसे बढ़ाना ही तो थोडा और स्वास्थ्यप्रद खाना खाया जाए | हालाँकि कुछ खास अवस्थाओं में कुछ पौष्टिक पूरक फायदा कर सकते है | मसलन, ऐसे बुजुर्ग जिनमे विटामिन- डी कम है ,गर्भवती महिला जिन्हें फोलिक एसिड लेने की सलाह दी जाती है | लेकिन उद्योग का समर्थन करने वाली हेल्थ सप्लीमेंट इनफोर्मेसन सर्विस का कहना है की अपने आहार में धीरे-धीरे सुधर कर रहे लोगों में विटामिन और मिनरल्स की मात्रा बढाने में सप्लीमेंट फायदेमंद है |
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सर्दी के मौसम में आसानी से उपलब्ध बथुए के साग को भोजन में अवश्य सम्मिलित करना चाहिए ,बथुए के पतों का साग पराठे,रायता बनाकर या साधारण रूप में प्रयोग किया जाता है |
कब्ज़ में बथुआ अत्यंत गुणकारी है,अतः जो कब्ज़ से अक्सर परेशां रहते है
उन्हें बथुए के साग का सेवन अवश्य करना चाहिए |
पेट में वायु हो गोला और इससे उत्पन्न सिरदर्द में भी यह आरामदायक है, आँखों में लाली हो या सुजन बथुए के साग के सेवन से लाभ होता है |इसके अलावा चरम रोग ,यकृत विकार में भी बथुए के साग के सेवन से लाभ होता है |
बथुआ रक्त को शुद्ध कर उसमे वृद्धि करता है | बुखार और उष्णता में इसका उपयोग बहूत ही कारगर होता है | यह आयरन और कैल्सियम का अजस्त्र भंडार है | औरतों को आयरनो तथ रक्त बढाने वाले खाद्यपदार्थ की ज्यादा जरूरत होती है | अतः उन्हें इसके साग का सेवन विशेष रूप से करना चाहिए |
खनिज लवणों की प्रचुरता से यह हरा साग-सब्जियां ,शरीर की जीवन शक्ति को बढाने खास लाभकारी होता है | इसकी पतियों का रस ठंढी तसिरयुक्त होने के कारण बुखार, फेफड़ों एवं आँतों की सुजन में फायदेमंद है |
बथुए के रस बच्चों को पिलाने से उनका मानसिक विकाश होता है, बथुए का १०० ग्राम रस निकल कर पीने से पेट के कीड़े मर जाते है | रस में थोडा-नमक मिलाकार पीने से पेट के कीड़े मर जाते है | रस में थोडा सा नमक मिलाकर इससे ७ दिनतक सेवन करना चाहिये | ५० ग्राम बथुए को एक ग्लास पानी में उबल-मसल कर छान कर पीने में स्त्रियों के मानसिक धर्म के गर बड़ी दूर होती है |
"( पथरी के रोगीओं को बथुए के साग का सेवन नहीं करना चाहिये ,क्युकी इसमें लौह तत्व अधिक होने के कारन पथरी का निर्माण होता है | "
बथुए के औषधीय महता :-----------
बथुए के सेवन अनेक प्रकार के रोगों के निवारण के लिए भी इसका प्रयोग घरेलु औषधि के रूप में भी किया जाता है :- जैसे
१. रक्ताल्पता :-- शरीर में रक्त की कमी पर बथुए का साग कुछ दिनों तक करने अथवा इसे आटे के साथ गुन्धकर रोटी बनाकर खाने से रक्त की वृद्धि होती है |
2.त्वचा रोग :--- रक्त को दूषित हो जाने से त्वचा पर चकते हो जाते है ,फोड़े,फुंसी निकल आती है | ऐसे में बथुए के साग के रक्त में मुल्तानी का लेप बनाकर लगाने से आराम मिलता है | साथ में बथुए का साग बनाकर या रस के रूप में सेवन करना चाहिये | इससे रक्त की शुद्धि होती है और त्वचा रोगों से छुटकारा मिलता है |
3.फोड़ा :- बथुए की पतियों को सोंठ व नमक के साथ पीसकर फोड़े पर बांधने से फोड़ा पककर फुट जाएगा या बैठ जायेगा |
४. पीलिया :- कुछ दिनों तक बथुए का साग खाने या सूप बनाकर पीने से पीलिया ठीक हो जाता है |
५. पीड़ारहित प्रसव :- बथुआ के १० ग्राम बीजों को कूटकर ५०० मिलीलीटर पानी में मिलाकर उबाले, जब आधा पानी रह जाए तो उतारकर छानकर पियें ,डेलिवरी से २० दिन के पहले से इसका प्रयोग करना चाहिए | इसमें बच्चा बिना ओपेरेसन के पैदा हो रहे है और प्रसव पीड़ा भी कम हो जाती है |
6.उदार कृमी : - इसके सेवन से पेट के कृमी स्वत मर जाती है |
7.जुआं और लीख :- बथुए की पतियों को उबालकर उस उबले हुए पानी से सिर धोने से सिर के सारे जुएँ ख़त्म हो जाते है |
8.अनियमित मासिक धर्म :- ५० ग्राम बथुआ की एक ग्लास पानी में उबाल-छानकर नियमित कुछ दिनों तक पीने से तथा उसकी सब्जी बनाकर खाने से | बथुआ की सब्जी हमेसा कुकड में बिना मिर्च मसाला के बनाकर खाना चाहिये |
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आज चर्चा करने जा रहा हूँ जो ( गाँव की शान है ,सेहत की जान है,) आम लोगों को आसानी से आहार में मिलता रहा है | इसकी गणना हरी पतेदार सब्जी में की जाती है | जो लौह तत्व और कल्स्शियम से भरपूर है | हमारे पूर्वजों की सबसे पसंदीदा शाक ( साग ) है जिसका नाम है बथुआ |
बथुआ में प्रायः शरीर के सभी पोषक तत्व पाए जाते है | मौसम के अनुसार उपलब्ध इसका सेवन करके छोटे-छोटे रोगों से अपना बचाव स्वयं किया जा सकता है | वैज्ञानिक शोधों से पता चल चूका है कि जिन सब्जियों को शीधे सूर्य से प्रकाश प्राप्त होता है,वे पेट में जाकर विषाणु-कीटाणुओं का नाश करती है | बथुआ भी उन्ही सब्जी में से एक है जिन्हें सूर्य का प्रकाश सीधे मिलता है |
विभिन्न प्रकार के पौष्टिक तत्वों से सुसज्जित बथुआ
एक सस्ता साग है | विशेषकर यह ग्रामीण क्षेत्र में सहजता से प्राप्त होने वाला प्रकृति का एक अनमोल तोहफा है | ग्रामीण इलाकों में बथुआ कि कोई उपियोगित नहीं है,जबकि प्रक्रति ने इसमें सभी प्रकार के अच्छाइयाँ समाहित कर रखी है | भोजन में इसकी मौजदगी से कई प्रकार के रोगों से बच सकते है | यह बाजारों में दिसंबर से मार्च तक आसानी से मिल जाता है |
बथुआ अपने आप गेहूं व जौ के खेतों में उग जाता है | इसके पते त्रिकोनाकर व नुकीले होते है , इसके पौधे पर सफ़ेद,हरे व कुछ लालिमा लिए छोटे-छोटे फुल होते है | बीज काले रंगे के सरसों से भी महीन होते है | पकने पर बीज खेत में गिर जाता है और साल भर तक जमीन के अन्दर पड़े होने के बाद अनुकूल जलवायु व परिस्थितियां मिलने पर स्वतः उग आते है |
बथुआ के बारे में प्राचीन आयुर्वेद ग्रन्थ में भी उल्लेख मिलता है | आयुर्वेद में इसकी दो प्रजातियाँ है ,एक गौड़ बथुआ जिसके पते कुछ बड़े आकर तथा लालिमा लिए होते है ,जो अक्सर सरसों ,गेहूं आदि के खेत में प्राप्त होता है | दूसरा है,यवशाक जिसके पतों पर लालिमा नहीं होती, पते भी पहले जाती के अपेक्षा कुछ छोटे होते है,जो अक्सर जौ के खेतों में अधिकतर मिलता है इसीलिए इसे यवशाक कहते है |
बथुआ को संस्कृत में वस्तुक,क्षारपत्र ( पतों में खरापर के वजह से ) शाकराट ( सागों का राजा ) ,हिंदी में बथुआ ,पंजाबी में बाथू, बंगाली में बेतुवा, गुजराती में वाथुओ,
महारास्त्र में चाकवत, और अंग्रेजी में ह्वाईट गुज फुट ( White goose foot ) कहते है ,इसका लैटिन नाम चिनोपोडियम अल्बम ( Chenopodium album ) है |
बथुआ में 70% जल होता है , इसके अन्दर पारा, लौह, क्षार, कैरोटिन व विटामिन C आदि खनिज तत्व पाए जाते है | भाव प्रकाश में इसके गुणों का उल्लेख में लिखा है कि बथुआ क्षारयुक्त, स्वादिष्ट, अग्नि को तेज करने वाला तथा पाचनशक्ति को बढ़ानेवाला है |
दीपनं पाचनं रुच्यं लघु शुक्रबलप्रदनम |
सरं प्लीहास्त्रपितार्शः कृमिदोषत्रयापहम ||
बथुआ का शाक पचने में हल्का ,रूचि उत्पन्न करने वाला, शुक्र तथा पुरुषत्व को बढ़ने वाला है | यह तीनों दोषों को शांत करके उनसे उत्पन्न विकारों का शमन करता है | विशेषकर प्लीहा का विकार, रक्तपित, बवासीर तथा कृमियों पर अधिक प्रभावकारी है |
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ताऊ .इन
आज मैं आपके सामने बच्चों के स्वास्थ्य से सम्बंधित बीमारियाँ के बारे में चर्चा करेंगे | विगत वर्ष एक बहूत ही अच्छी ,साफ-सुथरी फ़िल्म बच्चों पे आधारित था |
जो बच्चों के अन्दर छुपा हुआ गुण और अबगुण के बारे में खूबसूरती से चित्रित किया था |
जिसके अन्दर आमिर खान साहेब जिस बीमारी के बारे में चर्चा कर रहा था वो था डिस्लेक्सिया ( Dyslexia ) |
डिस्लेक्सिया वह तंत्रिका गरबड़ी है जो बच्चों को होती है | ऐसे बच्चे अक्सर अक्षर और शब्दों को पहचानने में भ्रमित हो जाता है | उन्हें लिखा हुआ अक्षर नाचते हुए या उल्टा नजर आता है |
जिसका असर उसकी बोलने,पढने व लिखने की क्षमता पर पड़ता है | ऐसे बच्चे अक्सर 'b' को 'p' या 'q' और '6' की संख्या को '9' की तरह पढता या लिखता है |
ऐसे में दुसरे बच्चे उन्हें छेड़ते या चिढाते है तो उसमे मनोवैज्ञानिक समस्याएं पैदा हो सकती है | इस तरह के बच्चे अपने मन को एकाग्र नहीं रख पाते है |
उनका ध्यान आसानी से बिखर जाता है | ज्यादा से ज्यादा १० से १५ मिनट के बाद वो वर्तमान काम से उकता जायेगा और कोशिस करेगा कहीं खेलने या कोई शरारत करने का | स्कुल में हंसी के पात्र बनने से बच्चा स्कुल जाने से कतराने लगता है | उसमे हीन भावना पैदा हो जाती है और वो अपना आत्मविश्वास खो बैठता है |
इसका कारण बच्चों में पोषक तत्व की कमी हो सकता है | अगर ऐसे बच्चों में B-complex Vitamins B1,B5, B6,B12 और C और साथ अच्छे आहार पोष्टिक पूरक दिया जाये तो वो निश्चित तौर पर इस तरह के बीमारी में फायदा मिलेगा |
जड़ी-बूटी सम्बंधित उपचार के लिए हमारे पास विश्व स्तरीय एलो जेल और साथ में पोष्टिक पूरक है जिसका विवरण निचे दिया जा रहा है :-
१.एलो बिट्स न पिचेज :- इससे आत्मसात्करण में सुधर,पौष्टिक,निरोधक प्रणाली में मजबूती आएगी |
२. ओमेगा ३ :- एकाग्रता की कमी दूर करेगा और तंत्रिकाएँ मजबूत करेगी |
३. रोयल जेली :- मल्टीविटामिन है, दबाब-तनाव में कमी,तंत्रिका संचार में सुधर करेगी |
४. जिनकगो प्लस :- स्मरणशक्ति और मस्तिष्क के क्रियाकलाप में सुधार |
ओमेगा ३ का स्तर कम होने के वजह से बच्चों के मानसिक विकाश में ज्यादा फर्क पड़ता है |
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आज बाजार में बिक रही हर चीज में मिलावट है , दालें,अनाज,दूध,घी से लेकर सब्जी और फल तक कोई भी चीज मिलावट से अछूती नहीं है |
ये मिलावट इतनी बारीकी से की जाती है कि मूल खाद्य पदार्थ तथा मिलावट वाले खाद्य पदार्थ में भेद करना काफी मुश्किल हो जाता है |मिलावट युक्त खाद्य पदार्थ का उपयोग करने से शरीर पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है तथा शरीर में विकार उत्पन्न होने कि आशंका बढ़ जाती है |
आमतौर पर प्रतिदिन इस्तेमाल किए जाने वाले अनाज भी हानिकारक रसायनों के प्रभाव से अछूते नहीं है , हर अनाज में कुछ प्रतिशत रसायन जरूर रहता है |
विगत कुछ दिन फरीदाबाद के समाचार पत्र के मुख्य शीर्षक था " मसालों का गरबरझाला" | अलग-अलग जगह से वो मसालों का नमूना लिए थे और जब उसे प्रयोगशाला में जाँच किया गया तो उसमे तकरीवन 60 प्रतिशत मसाला में कुछ न कुछ मिलावट पाया गया |
दरअसल उन मुनाफखोड़ों /मिलावट करने वाले को ये नहीं पता है जो वे दुसरे लोगों के लिए बेच रहे है वो उनके सगे-सम्बंधित भी खा कर अपनी जान मुसीबत में डाल रहा होगा |
वे लोग इस तरह से मिलावटी खाद्य पदार्थ को परोसकर लोगों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर रहे है | ऐसे लोगों के खिलाफ सरकार को सख्त कदम उठानी चाहिए जो खुलेआम लोगों के साथ धोखाधड़ी कर रहे है |
किसी भी खाद्यपदार्थ में कोई रासायनिक या बाहरी अन्य चीज मिलाने से उसकी गुणवता में कमी आ जाती है ,तो उस खाद्य पदार्थ को मिलावटयुक्त पदार्थ कहा जाता है |
जैसे दूध में पानी या यूरिया मिलकर बेचना ,मसलों में बुरादा रंग अदि मिलाना इस प्रकार के मिलावटी पदार्थ में पोषक तत्व नष्ट हो जाते है | कभी-कभी अनुचित तरीके से संग्रहित किये गए भोज्य पदार्थ से पोषक तत्व नष्ट हो जाते है |
कई ऐसे खाद्य सामग्री है जिसे बनाते समय कपडा धोने वाले सोडे का प्रयोग किया जाता है | इस प्रकार का सोडायुक्त सामग्री पाचन तंत्र और रक्तचाप के लिए नुकसानप्रद है |
इस प्रकार तुरंत मिलावटी आंटा, दाल बड़ा, दही बड़ा, गुलाब जामुन, ढोकला आदि बनाए जाते है | आता के साथ अलग पुडिया में उसकी चटनी और मसाला होता है | इसमें मनमानी मिलावट की गई होती है इस प्रकार की सामग्री सेहत के लिए अत्यंत हानिकारक होती है |
फलों को जल्दी पकाने के लिए पेस्टी साइड्स का इस्तेमाल ,सब्जियों को जल्दी उगाने और बढाने के लिए रसायनों का दुस्प्रभाव भी शरीर पर पड़ता है | सरकारी और गैर सरकारी संगठनों के तमाम प्रयासों के बावजूद खानपान के सामन में मिलावट आम बात हो गई है |
खाद्य पदार्थ व मिलावटी सामग्री-------------
मिर्च पाउडर -------- इसमें लाल रंग व भूसा तथा ईट और बालू का चूर्ण मिलाया जाता है | इसकी जांच के लिए एक ग्लास पानी में एक चम्मच मिर्च पाउडर मिलाये |
अगर पानी का रंग लाल हो जाता है तो यह मिलावटी समझे | इसमें ईट या बालू का चूर्ण होगा तो सतह में इकठ्ठा हो जायेगा | कई बार लाल मिर्च पाउडर में रोडामाइन बी मिलाया जाता है | इससे यकृत,गुर्दे व तिल्ली प्रभावित होती है
आटा------------------ इसमें रेत, चॉक पाउडर अदि मिलाया जाता है | अगर आटा गूंधने में पानी अधिक लगता हो ,रोटियां अच्छी तरह फूलती है और स्वाद मीठा हो तो शुद्ध है |
चना और अरहर की दाल ----- दालों में प्रायः खेसारी दाल की मिलावट की जाती है | खेसारी दाल में एक विशेष प्रकार के जहरीला रसायन होता है | इसके सेवन से स्नायु कमजोर पड़ जाते है | पाचन तंत्र प्रभावित होता है गुर्दे में पथरी होने की आशंका रहती है |
विभिन्न मसाले -------- विभिन्न मसालों में कंकड़ ,पत्थर ,रेत, मिटटी, लकड़ी का बुरादा अदि मिलकर बेचे जाते है | इससे आहार तंत्र के रोग आंत और दांत प्रभावित होते है |
चायपती----------- इसमें कृत्रिम रंग , लौह चूर्ण तथा प्रयोग हो चुकी चाय की पतियों,का पाउडर मिलाया जाता है | इससे आहार तंत्र और पाचनतंत्र प्रभावित होता है |
काली मिर्च----------------- इसमें पपीते के बीजों का मिश्रण किया जाता है |
दूध -------- दूध में सफ़ेद रंग, पानी, यूरिया, वाशिंग पाउडर, आदि मिलकर बेचा जाता है | दूध में मिले यूरिया से किडनी फेल हो सकती है |
शहद ------------- शहद में गुड़, अथवा खांड की चाशनी ,तथा शक्कर की मिलावट की जाती है |
मावा - ,शुद्ध घी,खाद्य तेल,हल्दी,कॉफ़ी जीरा इत्यादि सब में कुछ न कुछ मिलावट किया जाता है |
मसाला या खाद्य पदार्थ खरीदते समय ब्रांडेड,और भरोसेमंद दुकान का चुनाव करनी चाहिए |
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इससे पहले के लेख में मैंने आपको अलसी के गुण से अबगत कराया है | आज आपको इसके औषधीय गुण के बारे में चर्चा करेंगे | चुकी किसी भी वनस्पति में अगर गुणों की भंडार हो तो उसके उपयोग से रोग से पीड़ितों को लाभ मिलेगा | ऐसी कई बीमारियाँ है जो अपने आप में लाइलाज कहा जा सकता है पर आप इसके उपयोग से निश्चित तौर पर आपका फायदा मिलेगा |
कमर तथा जोड़ों का दर्द ------------------- अलसी ( तीसी ) के तेल में सोइठ का चूर्ण तथा नमक मिलाकर गर्म करके मालिश करने से कमर तथा पीठ दर्द दूर हो सकता है | अथवा अलसी के तेल को सिद्ध करके रख ले ,जरुरत पड़ने पर इसका प्रयोग करें | सिद्ध करने की विधि इस प्रकार है :- २५० ग्राम तीसी के तेल में १५ ग्राम शोंठ चूर्ण व १५ ग्राम नमक डालकर धीमी आग पर पकाई | जब धुँआ उठने लगे तो इसे उतार कर शीशी में बंद करके रख ले | इसीस तेल का मालिश से पीठ दर्द, जोड़ों का दर्द ,मसल्स में दर्द,करना |
पीसी हुई अलसी में इसबगोल मिलकर लेप लगाने से जोड़ों के दर्द में आराम मिलता है |
सिरदर्द------------- पीसी हुई अलसी को ठंढे पानी में मिलकर उसका लेप बनाकर सर के ऊपर लगाने से दर्द से रहत मिलती है |

कान दर्द -------------- अलसी ( तीसी ) के काढ़े को छानकर उसमे प्याज का रस मिलाकर कान में डालने पर कान दर्द में आराम होता है |
आँख के लाल होने पर -------------- पीसी हुई तीसी को आँखों के कोरों पर लगाने से लालिमा से छुटकारा मिलता है |
श्वास और दमा -------- इस परिस्थिति में ५ ग्राम अलसी को ५० मिली लीटर पानी में उबालकर उस पानी को सुबह-शाम दो बार ले | इस कार्य को करने के लिए तीसी और पानी को रात्रि में फुलाने के बाद उस जल को सुबह उबल कर सेवन करना चाहिए | इस रोग से पीड़ित व्यक्ति को ३ ग्राम तीसी लेकर इसे २५० ग्राम जल में अच्छी तरह उबल ले | पुनः इस जल को एक घंटे तक ढककर रखने के बाद शहद मिलकर सेवन करें, या सुखी खांसी व दम के लिए अत्यंत उपयोगी है |
सर्दी-जुकाम -------- भुनी तीसी के चूर्ण को शहद के साथ लेने से जुकाम में लाभ होता है ,साफ की हुई तीसी को कढाई में भुने | जब तीसी का सुगंध आने लगे तक इसे आग से उतार कर सूक्ष्म चूर्ण बना ले और फिर उसमे अलसी के बराबर मिश्री मिलाये |मिश्री और तीसी के इस मिश्रण १०-१५ ग्राम की मात्र को दिन में दो बार गर्म पानी के साथ ले , यह सर्दी जुकाम ,कफ में फायदेमंद होगा |
वातजनित रोगों में तीसी ------ यह अत्यंत उपयोगी औषधि है , इसके लिए ५० ग्राम तीसी को कडाही में भुन ले,फिर इसे चूर्ण करें ,इसमें ५० ग्राम मिश्री मिलाए,फिर १० ग्राम लाल मिर्च मिलकर इसकी ३ से ६ ग्राम की गोली तैयार करें , इसकी एक छोटी गोली बच्चे को अवाम बड़ी गोली व्यस्क को सुबह दे, इससे कफ और वातरोग में रहत मिलती है ,इस गोली को लेने के एक घंटे तक पानी का सेवन नहीं करना चाहिए |
सुजाक ------------- शुद्ध तीसी का ४ से ६ बूंद तेल नियमित सुबह-शाम शिशन पर मवाद साफकर लगाने से गिनोरिया ( सुजाक) ठीक हो जाता है |
मूत्र विकार ----------------- मुलेठी और तीसी की समान मात्रा लेकर उसे पीसकर चूर्ण बना ले,इस चूर्ण की ४० से ५० ग्राम मात्रा १ लीटर पानी में उबले ,फिर इसे अछि तरह ठंढा कर,इसे छानकर बोतल में सुरक्षित रख ले,इस जल की २३ से ३० ग्राम मात्रा तिन-तिन घंटे के अन्तराल पर सेवन करें, इससे पेशाब सम्बंधित जलन,दर्द,मवाद,रक्त आदि की शिकायत ठीक हो जाएगी |
वीर्य रोग ------- इसमें तीसी को कलि मिर्च और शहद के साथ सेवन करने से पुरुषों में वीर्य और शुक्रानुजनित विकार दूर हो जाते है |
जलने पर-------- शुद्ध तीसी के तेल के साथ चुने के पानी को लेकर इसे अच्छी तरह से फेंटे,यह सफ़ेद मलहम की तरह हो जायेगा ,इसे जली हुई जगह पर दिन में दो बार लगाए, इससे जलन और दर्द से निजत मिलेगी |
गांठ और ट्यूमर ---------- तीसी व हल्दी के चूर्ण को पानी या दूध में मिलकर सुगमता से पका कर लेप बना ले ,इस गर्म लेप को पान के पते पर रखकर बांधे,इससे गांठ और ट्यूमर या गांठ वाली जगह पर रखकर बांधे, यह क्रिया दिन में ४-५ बार करते रहे ,इससे गांठ और ट्यूमर के दर्द और जलन से छुटकारा मिलेगा, यह मवाद नहीं बनने देगा |
ऐसा लगता है की एलोवेरा जेल और इसके पौष्टिक पूरक अगर नियमित कोई ब्यक्ति सेवन करें तो उन्हें ऐसी वैसी कोई भी बीमारियाँ कभी नहीं हो सकता |और साथ में अलसी जैसे महानतम जड़ी-बूटी वाली औषधि | यह मानव जाती के लिए इस धरती पर वरदान स्वरुप है | आहार और दिनचर्या को ठीक कर मनुष्य जीवन पर्यंत सुखी रह सकता है |
सावधानी ---------- तीसी के बीज में विषैला ग्लुकोसाइड पाया जाता है ,अतः अधिक मात्रा में इसे पशुओं को खिलाना खतरनाक है |
कच्ची तीसी का अधिक मात्रा में सेवन नहीं करना चाहिए ,क्योंकि इसमें पायी जाने वाली हाइड्रोजन साइनाईट विषाक्त प्रभाव डालती है |
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ताऊ .इन
मेरी जिज्ञासा तीसी के बारे में इसलिए बढ़ा जब सुना की इसके अंदर अपार शक्ति है जैसे की प्रोटीन्स,विटामिन,ओमेगा-३ ओमेगा-६,लिग्नेन ,फैबर इत्यादि -------
आजकल अलसी ( तीसी ) के बारे में समाचारपत्र,टीवी ,इंटरनेट के माध्यम से बहूत कुछ सुनने को मिल रहा है | यह शीत ऋतू में पैदा होने वाली एक वर्षीय तिलहन फसल है | अपने देश में इसका पैदावार काफी मात्रा में होती है | अलसी यानि तीसी के फुल नीले रंग का होता है | इसके पाँच हिस्से होते है ,इनमे चपटे व भूरे रंग के बीज होते है | इन्ही बीजों को निकालकर खाद्य पदार्थ बनाने व तेल निकालने के लिए किया जाता है | विश्व स्वास्थ्य संगठन ( W.H.O.) ने अलसी को सुपर स्टार फ़ूड का दर्जा दिया है |
तीसी की ढेरो प्रजातियाँ पायी जाती है | कुछ प्रजातियाँ गर्म मौसम में भी उगाए जाते है |बीज से तेल व खली प्राप्त की जाती है | इसके तेल से बिभिन्न प्रकार के खाद्य सामग्री तैयार की जाती है जो अत्यंत स्वादिष्ट व कोलेस्ट्रोल रहित होते है |
अलसी का बोटानिकल नाम है लिनम युजिटेटीसिमम ( Linum Usitatissimum ) यानि अति उपयोगी बीज है | इसे अंग्रेजी में लिनसीड ( Linseed ) या फ्लेक्स्सीड (Flexseed), गुजराती में जवास,कन्नड़ में अगसी,बिहार में तीसी,बंगाल में तिशी ,तेलगु में अविसी जिन्जालू,मलयालम में चेरुचना विदु,तमिल में अली विराई और उड़िया में पेसी कहते है |
तीसी में प्रचुर मात्रा में रोगनिवारक व पोषक तत्व पाए जाते है जिनमे कर्बोहाईड्रेट , शुगर ,रेशा, वसा,प्रोटीन, विटामिन्स , कैल्शियम, पोटाशियम,मैग्नेशियम,फोस्फोरस, लोहा, जस्ता, आदि प्रमुख है | इसके अलावा प्रत्येक १०० ग्राम तीसी में ऊर्जा ५३० कैलोरी पायी जाती है |
पहले इसका प्रयोग भोजन, कपडा, व रंगरोगन बनाने के लिए होता आया है | अलसी में अपार पोष्टिक तत्व है | यह बचपन से बुढ़ापे तक के लोगों को फायदेमंद है | महात्मा गाँधी ने स्वास्थ्य पर भी शोध किया व बहूत से पुस्तक भी लिखी | उन्होंने अलसी पर भी शोध किया, इसने चमतकारी गुणों को पहचाना और एक पुस्तक में लिखा था ------" जहाँ अलसी का सेवन किया जायेगा ,वह समाज, स्वास्थ्य व समृधि रहेगा |
तीसी में लिग्निन और ओमेगा-३ वसा अम्ल पाया जाता है ,यह कई तरह के ट्यूमर को बढ़ने से रोक देता है | एक शोध से यह पता चला है की इसमें कैंसर रोधी तत्व भी पाए जाते है |स्तन कैंसर व प्रोस्टेट कैंसर में भी उपयोगी है | यह डायबीटिज में रक्त शर्करा के स्तर को स्थिर रखता है | इससे रक्त संचार में वृद्धि होती है और खून ज्यादा गाढ़ा नहीं होने देता जिससे उसमे थक्के नहीं जमते | यह ह्रदय रोगी के लिए उपयुक्त पथ्य है,सर्दी-जुकाम में भी उपयोगी है | तीसी खाने वाले व्यक्ति को ह्रदय घाट की सम्भावना बहूत कम रहती है |

यह थोड़ी मिठास के साथ हल्का सुगन्धित होता है,यह तैलीय,उष्ण,शक्तिवर्धक,भरी तथा कामशक्ति को बढ़ाने वाला है | थोड़ी मात्रा में ली गई तीसी वात,कफ, पित, और नेत्र रोगों में लाभकारी है |
हमारे शारीर के स्वास्थ्य संचालन के लिए ओमेगा-३ व ओमेगा-६ दोनों ही आवश्यक होते है | अब यूँ मान लीजिये ओमेगा-३ नायक,और ओमेगा-६ खलनायक है | ठीक उसी प्रकार जैसे एक अच्छी फिल्म के लिए नायक और खलनायक दोनों ही आवश्यक है | पिछले कुछ दशकों से हमारे भोजन में ओमेगा-६ की मात्रा बढती जा रही है | और ओमेगा-३ की कमी होती जा रही है |
मल्टीनेसनल कंपनियों द्वारा परोसे जा रहे डिब्बा बंद फ़ूड व जंक फ़ूड ओमेगा-६ फैटी एसिड से भरपूर होते है | शोध से पता चला है की हमारे विकृत हुई आहार शैली से हमारे भोजन में ओमेगा-३ की कमी और ओमेगा-६ बढ़ोतरी के वजह से हम हाई ब्लडप्रेशर, हार्ट अटैक,स्ट्रोक,डायबिटिज, मोटापा, गठिया, डिप्रेसन, दमा, कैंसर आदि रोगों के शिकार हो रहे है | ओमेगा-३ की यही कमी रोज 30-60 ग्राम अलसी ( तीसी) खाकर आसानी से पूरी कर सकते है |
इसी कारण अलसी को सुपर स्टार फ़ूड का दर्जा दिलाते है |
अलसी हमारे दिमाग को शांत,चित्प्रसन्न रखता है | तनाव दूर होता है,बुद्धिमता व स्मरण शक्ति बढती है तथा क्रोध नहीं आता | इससे एक दैविक शक्ति और एनर्जी का प्रवाह होता है | अलसी बढ़ी हुई प्रोस्टेट ग्रंथि, सेक्स उतेजना में कमी ,शीघ्रपतन आदि में भी बहुत ही लाभदायक है | यदि माँ के स्तन में दूध नहीं आ रहा है तो उसे अलसी खिलाने के 24 घंटे के भीतर ही स्तन में दूध आने लगता है | यदि माँ अलसी सेवन करती है तो उसके दूध में ओमेगा-३ प्रयाप्त मात्रा में रहेगा जिससे बच्चा अधिक बुद्धिमान व स्वस्थ्य पैदा होता है | एक शोध से यह भी पता चला है की जल्दी ही लिग्नेन एड्स का सस्ता,सरल और कारगर इलाज साबित होने वाला है |
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आजकल पाश्चात्य शैली के शौचालय का प्रचलन बढ़ता ही जा रहा है क्यूंकि लोगों को इससे सुविधा होती है | शौच जाते समय पैरों या घुटनों को कष्ट नहीं उठाना पड़ता है | फिर आराम ही आराम ,बेफिक्र होकर वहीँ बैठकर अखबार पढो या लैपटॉप पर काम करो या लोगों से मोबाईल पर व्यव्शायिक बाते करों | अब अखबार पढने या अन्य कार्य करने की प्रक्रिया में चाहे मूल क्रिया को ही भूल जाओ | पर क्या वास्तव में ये ठीक है ? शायद नहीं | कितनी विकृत हो गई है हमारी जीवन शैली और हमारी आदतें ? जीवन में सम्पूर्ण परिवर्तन व उपचार के लिए विकृत विचारों के साथ-साथ विकृत जीवनशैली और आदतों को बदलना भी अनिवार्य है |
शौच जाने के पारंपरिक तरीके में हम उकडू बैठकर निवृत होते है |इससे पैरों का व्यायाम भी हो जाता है | हम जितनी बार मल-मूत्र विसर्जन के लिए उकडू होकर बैठकर निवृत होते है उतने ही बार पैरों का ही नहीं कूल्हों तक का सभी अंगों व उपांगों का व्यायाम हो जाता है | पैरों के बल बैठकर शौच जाते समय एक सबसे महत्वपूर्ण योगिक क्रिया भी स्वतः हो जाती है और वो है पवनमुक्त आसन का अभ्यास |जब हम पवनमुक्त आसन करते है तो पीठ के बल लेटकर पैरों को मोड़कर पेट पर दबाव डालते है जिससे आँतों में व्याप्त दुर्गन्धयुक्त वायु बहार निकल जाती है |
उकडू बैठकर शौच जाते समय भी हम पवनमुक्त आसन की अवस्था में ही होते है | शौच के बाद यदि पैरों अथवा जंघावों का दबाव उदर या आंतों पर डालेंगे तो इससे आंतो में व्याप्त दुर्गन्धयुक्त वायु बहार निकल जाएगी | यदि आंतो में मल की मात्र भी बची होगी तो वो भी बहार आ जाएगी और इस प्रक्रिया में हमें पवनमुक्त आसन का पूरा लाभ मिलेगा |
पाश्चात्य शैली के शौचालय में ये लाभ हमें नहीं मिल पाता है बल्कि शारीर के बिभिन्न अंगो की गति कम होने के कारण शरीर में जड़ता ,निष्क्रियता व्याप्त होने लगती है जिससे बीमारी ठीक होने के बजाय और भी बढ़ने लगती है |
पाश्चात्य शैली के शौचालय में एक सबसे बड़ी कमी और भी है और वो है स्वच्छता का आभाव | सार्वजानिक शौचालय में पाश्चात्य शैली के शौचालय का प्रयोग करना अत्यंत घातक है | इनमे न केवल गंदगी के कारण संक्रमण का खतरा बना रहता है अपितु पानी का भी अधिक आवश्यकता पड़ती है अतः पारंपरिक तरीके का शौचालय का प्रयोग करना ही अधिक सुरक्षित व व्यवहारिक तथा स्वास्थ्यप्रदायक है |
एक सबसे खास बात अगर सुबह-सवेरे शौच खुल कर आ जाये तो आपके दिन चर्या स्वतः ठीक हो जाता है |
शरीर में स्फूर्ति और मन अपने कार्य क्षेत्र में लगा रहता है | स्वस्थ्य आंत यानि की स्वस्थ्य तन व मन | आप शारीरिक व मानसिक दोनों रूप में चुस्त और दुरुस्त नजर आते है | मतलब साफ़ है सुबह की दिनचर्या बिलकुल स्वक्ष होना ही चाहिए अन्यथा आप शारीरिक और मानसिक रूप से दिन भर थके-थके से रहेंगे |
अगर किसी भी व्यक्ति को शौच खुल कर नहीं आने की समस्या हो यानि कब्ज़ या गैस से पीड़ित हो तो आप एलो वेरा जेल का नियमित सेवन शुरू करें | आप कुछ ही महीनो में इस तरह की बीमारी से छुटकारा पा सकते है | चुकी कब्ज़ व गैस आपके लिए साइलेंट किलर का काम करता है | 90% बिमारियों का शुरुआत पेट का साफ़ नहीं होने से होता है ,ऐसी मान्यता है | इसीलिए आप अपने आपको एलो जेल के माध्यम से पेट को स्वक्ष रखें फिर आपके जीवन में उर्जा का संचार स्वतः हो जायेगा |
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