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Aug 19, 2010

दिव्य स्वास्थ्य रक्षक वनौषधि अर्जुन

अर्जुन- इसे लोग धवल,ककुभ तथा नदीसर्ज ( नदी-नालों के तट पर होने के वजह ) भी कहा जाता है | साधारण बोलचाल की भाषा में इसे कहुआ तथा सादड़ों नाम से जाना जाता है | यह एक सदाबहार वृक्ष है जिसे अलग-अलग भाषा व प्रान्त में अलग-अलग नाम से जाने जाते है जैसे- संस्कृत में - ककुभ,हिंदी में - अर्जुन,बंगला में-अर्जुन गाछ,तेलगु में- तेल्लमदिद, कन्नड़ में मदिद, तेलगु में- तेल्लमदिद, तमिल में -मरुदमरभ या बेल्म, अंग्रेजी में - अर्जुन वृक्ष कहा जाता है | वानस्पति नाम टर्मिनेलिया अर्जुन है |

अपने देश के लगभग प्रत्येक प्रान्त में पाया जाता है , खास कर बिहार, उतर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हिमालय के तराई वाले क्षेत्र और शुष्क पहाड़ी क्षेत्रों में नालों , सड़क के किनारे एवं बाग़-बगीचों में पैदा होता है | यहाँ तक की दिल्ली के इंडिया गेट में भी इसके वृक्ष है | यह एक सदा हरि रहने वाला वृक्ष है |

अर्जुन वृक्ष की छाल का ही मुख्य रूप से औषधि के रूप में उपयोग होता है | इसके छाल उतारने के लिए कम से कम दो वर्ष ऋतुएँ चाहिए | एक वृक्ष में छाल तिन साल के चक्र में मिलती है | छाल उतरने के बाद पुनः छाल आ जाती है | इसकी छाल ऊपर से सफ़ेद, अन्दर से चिकनी, मोती तथा हलके गुलाबी रंग की होती है और कई बार वर्ष में स्वतः निकलकर निचे गिर पड़ती है | छाल का स्वाद कसैला, तीखा होता है | इसमें गोदने पर एक प्रकार के दूध सा निकलता है |

वसंत ऋतू में वृक्ष पर नए पते आते है जो छोटी-छोटी टहनियों पर लगे होते है | इसके पते अमरुद के पते के आकर का 6 से 20 से.मी.लम्बे आयताकार होते है | वृक्ष पर पते आते ही शाखाओं पर फुल भी आते है | अर्थात अर्जुन वृक्ष पर वसंत ऋतू या वैशाख या जयेष्ट मॉस में सफ़ेद-पीले हरियाली युक्त छोटे-छोटे फुल मंजरियों में आते है | इनमे हलकी सुगंध भी होती है | इसके फल लम्बे-अंडाकार 5 या 7 धारियों वाले जेष्ठ से श्रावण मास के बीच लगते है और शरद ऋतू में पकते है | स्वाद कसैला होता है | फल ही अर्जुन वृक्ष का बीज है | अर्जुन वृक्ष का गोंद स्वच्छ , भूरा-सुनहरा सा व पर्दाश्क होता है | यह गोंद भी खाने के काम आता है तथा ह्रदय के लिए हितकारी माना जाता है |

भारत में अर्जुन वृक्ष की कम से कम 15 प्रजातियाँ है | सभी वृक्षों की औषधीय क्षमता अलग-अलग होता है | इसी कारण यह पहचान करना बहुत जरुरी है की कौन से वृक्ष की छाल औषधि रूप में ह्रदय रक्तवह संस्थान पर कार्य करती है |

औषधीय गुण वाले अर्जुन वृक्ष
की छाल अन्य पेड़ों की छाल की तुलना में कहीं अधिक मोती तथा नरम होती है | रेशा रहित यह छाल अन्दर से रक्त जैसी लाल रंग की होती है | पेड़ पर से छाल चिकनी चादर के रूप में उतरती है ,क्यूंकि अर्जुन का ताना काफी मोटा होता है |

संग्रह विधि :- औषधि रूप में आमतौर पर अर्जुन वृक्ष की छाल ही उपयोग की जाती है | अतः इसकी छाल को अच्छी तरह से सुखा कर छोटे-छोटे टुकड़ों में काट कर या फिर चूर्ण के रूप में ढक्कनदार पात्रों में भर कर ठंढे स्थानों पर रखा जाता है | इस प्रकार संग्रहित की गई अर्जुन वृक्ष की छाल 2 वर्ष तक प्रभावशाली बनी रहती है |


औषधि गुण :- प्राचीन आयुर्वेद शास्त्रियों में वागभट्ट ही ऐसे एकेले वैद्य थे जिन्होंने सबसे पहली बार इस औषधि के ह्रदय रोगों में उपयोगी होने की विवेचना की थी | उनके बाद चक्रदत और भाव मिश्र ने भी अर्जुन वृक्ष की छाल को ह्रदय रोगों की महौषधि स्वीकार किया | चक्रदत ने ऐसा माना है की घी,दूध या गुड़ जे सतग ही अर्जुन वृक्ष की छाल का चूर्ण, नियमित सेवन करता है, उसे हृदयरोग,जीर्ण ज्वर,रक्त पित जैसे रोग कभी नहीं सताता और वह चिरंजीवी होता है |

अतः मानव जीवन के लिए अर्जुन वृक्ष एक वरदान स्वरूप है | विस्तार में इसके औषधि गुण के बारे में हम अगले अंश में चर्च करेंगे | चुकी इसके औषधि गुण की लिस्ट बहुत लम्बी है तो इंतज़ार कीजिये अगले अंश की |

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2 comments

Suman August 19, 2010 at 9:17 AM

nice

Ratan Singh Shekhawat August 19, 2010 at 6:11 PM

अर्जुन की छाल के चूर्ण से बनाया काढ़ा पीने से रक्तचाप में उतना ही फायदा होता है जितना दवा की गोली खाने पर | और हाँ ये निम्न और उच्च दोनों किस्म के रक्तचाप में बराबर फायदा पहुंचाता है , मैंने तो इसे आजमाकर भी देखा है दरअसल अर्जुन के छाल के चूर्ण से बना काढ़ा हृदय की गति को नियमित करता है इसलिए यह रक्तचाप बढ़ने या घटने दोनों स्थितियों में उपयोगी रहता है |

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