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Aug 21, 2010

रसौली का इलाज एलोवेरा व पौष्टिक पूरक से करें

कैंसर की बिमारी उस समय होती है जब शरीर की कोशिकाएं अनियंत्रित हो जाती है | अनुपयुक्त जीवनशैली व भोजन को कैंसर के 60 प्रतिशत मामलो के लिए जिम्मेदार माना जाता है | धुम्रपान,एक्सरे का अत्यधिक रेडीएशन, सूर्य की अल्ट्रावायलेट किरणों का दुष्प्रभाव, रसायन, अनुपयुक्त भोजन, संदुष्ण,कुछ हरमों और विरासत में मिली जिन विकृतियाँ कैंसर का कारण बन जाती है |

अनियंत्रित असामान्य कोशिका वृद्धि कैंसर पैदा कर देती है और तब ये असामान्य कोशिकाएं बड़ी तेजी से बढ़कर प्रतिरोधक प्रणाली पर हावी हो जाती है | नतीजतन कैंसर जिस्म के दुसरे हिस्से में फ़ैल जाता है |


वर्धन ( Growths ) की दो श्रेणिया है :-
एक - गाँठ, फोड़ा, साधारण ट्यूमर ( रसौली ) इत्यादि |
दो - विशालू रसौली ( Malignant Tumor ) या कैंसर प्रभावित वर्धन ( Canceroucus Growth ) |


गांठ ( Cyst) :- छोटी थैली जैसे वर्धन या रेशेदार उतक ( Fabrous Tissue) में गुहिका ( Cavity ) बन जाती है और उसमे अर्ध-ठोस पदार्थ भर जाता है | यह हानिरहित वर्धन है और आमतौर से त्वचा पर या प्रजनन अंगों से होता है | दर्द के साथ छोटी सी सुजन पैदा होती है, बुखार हो जाता है, लेकिन इससे आगे यह नहीं फैलती | इलाज करने के बाद यह वर्धन दोबारा नहीं होता | कभी-कभी वर्धन संदूषित हो जाता है तो इसका ऑपरेशन करना पड़ता है |

फोड़ा ( Abscess ) :- जब हमलावर बैक्टेरिया को खत्म करने के लिए सफ़ेद रक्त खोशिकाएं कारवाई करती है तो किसी स्थान पर मवाद इकट्ठा हो जाता है | यह शारीर के किसी भी भाग में हो सकता है :- फेफड़े, मस्तिस्क, मसुढे जिगर, स्तन आदि में | फुंसी छोटा फोड़ा है जो किसी बाल के कूप के आसपास ही जाता है | फुंसी बैक्टेरियाई या वायरल संदुष्ण , मधुमेह, अपौष्टिक आहार या संदुष्ण के फैलने से हो सकती है | बड़े फोड़े से मवाद निकालने के लिए इलाज की जरुरत पड़ सकती है |

साधारण रसौली ( Ordinary Tumour ) :- जब अनियंत्रित और अकारण कोशिकाओं का असामान्य वर्धन होता है, तो आमतौर से त्वचा के निचे वसायुक्त उतक, रक्त या मांसपेशी के उतक में एक कड़ी सुजन-सी हो जाती है | यह सुजन हानिरहित होती है | इसमें न पीड़ा होती है और न ही संदुष्ण होता है | जब इसे निकल दिया जाता है, तो दोबारा नहीं होती या फैलती है |


फाइब्रायड्स (गर्भाशय रसौली )(Fibroids ) :- यह गर्भाशय का अहानिकारक वर्धन है जिससे श्रोणीय ( Pelvic ) पीड़ा और मासिकधर्म के दौरान भरी रक्तस्त्राव होता है | अन्य लक्ष्ण है पेट में सुजन, पीड़ा और बार-बार पेशाब लग्न, गर्भाशय उतक में असामान्य वर्धन आदि | अन्य समस्या है गर्भाशय का निचे खिसकना और अनुर्वरता |

कई महिलायें 35 और 55 की उम्र के बिच इस दशा के कारण हिस्टेरेक्टमी करा लेती है यानि गर्भाशय निकलबा देती है | इसके बाद मासिक धर्म बंद हो जाता है और महिला गर्भवती नहीं हो सकती है |

सामान्यतया यां ऑपरेशन कराना अनावश्यक होता है और शायद इससे नुकसान भी होता है क्यूंकि रजोनिवृति के बाद भी एंडीक्राईन प्रणाली में गर्भाशय अहम् भूमिका निभाता है |

हिस्टेरेक्टमी से लम्बे अरसे में काफी जोखिम पैदा हो जाते है, जैसे कामुकता में कमी, सम्भोग के दौरान दर्द, हताशा का भाव, और डिम्ब ग्रंथियों को छोड़ दिए जाने के बाद भी असमय रजोनिवृति | फाइब्रायड्स( गर्भाशय रसौली ) के अब कई अन्य उपचार उपलब्ध है | डिंब-ग्रंथियों, गर्भाशय या सर्विक्स के कैंसर के उपचार में ही हिस्टेरेक्टमी कराना आवश्यक होता है |

जड़ी बूटी सम्बंधित उपचार के लिए निचे दिए जा रहे है :- ( गांठ, फोड़ा, रसौली तीनो के लिए उपचार एक ही है )
1 . एलो वेरा जेल
2 . गार्लिक थाइम
3 . बी प्रोपोलिस
4 . रोयल जेली
5 . पोमेस्टीन पॉवर
उपरोक्त आहारीय पूरक लेकर आप ऐसे रोग से मुक्ति पा सकते है | यह उत्पाद 100 प्रतिशत सुरक्षित है और इनका कोई भी दुष्प्रभाव नहीं होता है |

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बगैर चीर फाड़ रसौली का इलाज आधुनिक तकनीक-यूट्रीन फाइब्रोइड एंबोलाइजेशन से |
"एलोवेरा " ब्लॉग ट्रैफिक के लिए भी है खुराक |
अरे.. दगाबाज थारी बतियाँ कह दूंगी !

1 comments

Ratan Singh Shekhawat August 22, 2010 at 6:23 AM

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